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गुरु प्रदोष व्रत 8 अक्टूबर 2026: आश्विन प्रदोष काल, पूजा विधि, कथा और मंत्र

Guru Pradosh Vrat Date 2026: गुरु प्रदोष व्रत 8 अक्टूबर 2026 को कब है?

प्रदोष व्रत हर मास की त्रयोदशी तिथि को संध्याकाल में भगवान शिव की पूजा के लिए रखा जाता है। जब यह त्रयोदशी गुरुवार को पड़े, तो उसे गुरु प्रदोष कहते हैं। आश्विन मास की कृष्ण त्रयोदशी पर इस व्रत में बृहस्पति देव की भी कृपा प्राप्त होती है, जो ज्ञान, शत्रु-विनाश और समृद्धि के लिए विशेष फलदायी है।

गुरु प्रदोष व्रत 2026: 8 अक्टूबर, गुरुवार | त्रयोदशी: 7 अक्टूबर रात्रि 11:16 बजे से 8 अक्टूबर रात्रि 10:15 बजे तक | प्रदोष काल: सायं 5:59 से रात्रि 8:27 बजे तक | आश्विन कृष्ण पक्ष

गुरु प्रदोष व्रत 8 अक्टूबर 2026: गुरुवार को भगवान शिव और बृहस्पति की संयुक्त आराधना, पीले पुष्प और बेलपत्र अर्पण

इस वर्ष गुरु प्रदोष व्रत गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026 को आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को पड़ रहा है। त्रयोदशी तिथि का आरंभ 7 अक्टूबर को रात्रि 11:16 बजे होगा और समापन 8 अक्टूबर को रात्रि 10:15 बजे होगा। प्रदोष काल का शुभ मुहूर्त सायं 5:59 बजे से रात्रि 8:27 बजे तक रहेगा, इसी समय में शिव पूजन करना सर्वश्रेष्ठ है। व्रत का पारण 9 अक्टूबर को सूर्योदय के पश्चात करें। आइए जानते हैं इस व्रत का महत्व, पूजा विधि और व्रत कथा

ध्यान रखें: उपरोक्त समय भारतीय मानक समय (IST) पर आधारित हैं। सटीक जानकारी के लिए अपने स्थानीय पंचांग अवश्य देखें।


Guru Pradosh Vrat Ka Mahatva: गुरु प्रदोष व्रत का महत्व जाने

त्रयोदशी की संध्यावेला वह पवित्र बेला है जब भगवान शिव कैलाश पर नृत्य करते हैं और समस्त देवगण उनकी स्तुति में निमग्न रहते हैं। जब यह तिथि गुरुवार को पड़े, तो उसे गुरु प्रदोष कहते हैं। गुरुवार देव-गुरु बृहस्पति का दिन है और बृहस्पति ज्ञान, विद्या, धर्म तथा समृद्धि के अधिपति हैं। इस दिन शिव-आराधना में बृहस्पति की शक्ति भी स्वतः मिल जाती है, जिससे व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है।

रन्धीर प्रकाशन के पंचांग में लिखा है कि शत्रु विनाश के लिये बृहस्पति प्रदोष व्रत करना चाहिए। गुरु प्रदोष व्रत के प्रभाव से शत्रुओं का नाश होता है, ज्ञान और बुद्धि में वृद्धि होती है और धन-धान्य से घर भर जाता है। जिनकी कुंडली में गुरु अस्त या नीच का हो, जो संतान सुख से वंचित हों, या विवाह में बाधा हो, उनके लिए यह व्रत विशेष फलदायी है। प्रदोष काल में शिवलिंग का पंचामृत अभिषेक और बेलपत्र-अर्पण करने से महादेव और देव-गुरु बृहस्पति दोनों की कृपा एक साथ प्राप्त होती है और जीवन के समस्त विघ्न दूर होते हैं।


Guru Pradosh Vrat Puja Vidhi: गुरु प्रदोष व्रत की पूजा विधि

  • गुरु प्रदोष व्रत के दिन क्या करें: सूर्योदय से पूर्व उठें, स्नान करें और पीले वस्त्र धारण करें। पीला रंग बृहस्पति का प्रतीक है। भगवान शिव और गुरुदेव का ध्यान करते हुए दिन आरंभ करें।
  • व्रत संकल्प: हाथ में पीले पुष्प और जल लेकर भगवान शिव से शत्रु विनाश, ज्ञान-वृद्धि, विद्या और समृद्धि के लिए व्रत का संकल्प करें।
  • गुरु प्रदोष व्रत के दिन क्या खाएं या पिएं: दिनभर फलाहार करें। साबूदाना, दूध, फल, कुट्टू का आटा और मेवे ग्रहण किए जा सकते हैं। अनाज, प्याज, लहसुन और तामसिक भोजन वर्जित है।
  • व्रत के नियम: किसी गुरु, विद्वान या बड़े-बुजुर्ग का अपमान न करें। दिनभर वाद-विवाद और असत्य से बचें। दिन में सोना वर्जित है और शिव का जप करते रहें।
  • प्रदोष काल की तैयारी: संध्या से एक घंटे पूर्व पुनः स्नान करें। यदि संभव हो तो शिव मंदिर जाएं। पूजा सामग्री में दूध, दही, शहद, घी, बेलपत्र, पीले पुष्प, कनेर, हल्दी-चंदन, अक्षत, धूप और दीपक रखें।
  • प्रदोष काल में पूजा: सायं 5:59 से 8:27 बजे के प्रदोष काल में पंचामृत और गंगाजल से शिवलिंग का अभिषेक करें। शिवलिंग पर हल्दी-चंदन लेप करें, पीले पुष्प और बेलपत्र अर्पित करें।
  • मंत्र जाप: ॐ नमः शिवाय का 108 बार जप करें। रुद्राक्ष माला पर महामृत्युंजय मंत्र और बृहस्पति मंत्र का पाठ करें। प्रदोष स्तोत्रम का पाठ करें।
  • व्रत कथा: पूजा के बाद गुरु प्रदोष व्रत की कथा का श्रवण करें। इन्द्र और वृत्रासुर की कथा गुरु भक्ति और शिव कृपा का सुंदर उदाहरण है।
  • दान: गुरुवार को पीले वस्त्र, चने की दाल, केला, हल्दी या सोने का दान शुभ माना गया है। ब्राह्मण को भोजन और दक्षिणा देना भी पुण्यदायी है।
  • पारण: अगले दिन 9 अक्टूबर को सूर्योदय के पश्चात शिवलिंग पर जल और बेलपत्र अर्पित करके सात्विक भोजन से व्रत तोड़ें।

Guru Pradosh Vrat Katha: गुरु प्रदोष व्रत की कथा

गुरु प्रदोष व्रत कथा: बृहस्पति जी का मार्गदर्शन, देवों का गुरु प्रदोष व्रत और इन्द्र की विजय

प्राचीन काल में इन्द्र और वृत्रासुर में घोर युद्ध हुआ। देव-सेना ने वृत्रासुर की सेना को पराजित कर दिया, किंतु जैसे ही वृत्रासुर स्वयं रणभूमि में उतरा, उसकी आसुरी माया से उत्पन्न विकराल रूप देखकर सभी देवता भयभीत हो गए। इन्द्र को भी समझ नहीं आ रहा था कि इस अजेय असुर को कैसे परास्त किया जाए। तब सब देवताओं ने मिलकर परम गुरु बृहस्पति जी का आवाहन किया। गुरुदेव तत्काल प्रकट हुए।

॥ ॐ नमः शिवाय ॥

बृहस्पति जी ने इन्द्र को वृत्रासुर की पूरी कथा सुनाई। उन्होंने बताया कि यह असुर पूर्वजन्म में चित्ररथ नामक राजा था जो कैलाश पर गया और भगवान शिव एवं माँ पार्वती का अनजाने में उपहास कर बैठा। माँ पार्वती के शाप से वह राक्षस-योनि में जन्मा और गन्धमादन पर्वत पर तप करके शिव से अपार बल प्राप्त किया। इसीलिए वह सामान्य शस्त्रों से अजेय है। फिर गुरु बृहस्पति ने देवराज इन्द्र को मार्ग दिखाया। उन्होंने कहा कि हे देवेन्द्र, अब तुम गुरुवार की त्रयोदशी को प्रदोष काल में भगवान शिव का व्रत विधिविधान से करो। जिस शिव की कृपा से वृत्रासुर को बल मिला, उन्हीं शिव की आराधना से तुम्हें विजय भी मिलेगी।

॥ ॐ नमः शिवाय ॥

गुरुदेव के वचनों में देवताओं को विश्वास जागा। सभी देवों ने गुरुवार की त्रयोदशी को एकचित्त होकर गुरु प्रदोष व्रत किया, शिवलिंग का अभिषेक किया और पूरे प्रदोष काल में भगवान शिव की स्तुति गाई। महादेव उनकी आराधना से प्रसन्न हुए और इन्द्र को विजय का वरदान दिया। उसी कृपा से देवताओं ने वृत्रासुर को परास्त किया।

गुरु बृहस्पति की प्रज्ञा ने जो मार्ग दिखाया,
शिव-भक्ति के उस व्रत ने देवों को विजय दिलाया।

जो भक्त इस कथा को श्रद्धापूर्वक सुनता और गुरुवार की त्रयोदशी को प्रदोष काल में सच्चे मन से भगवान शिव की आराधना करता है,
उसे शत्रुओं पर विजय, ज्ञान और समृद्धि की प्राप्ति होती है तथा देव-गुरु बृहस्पति की कृपा सदा बनी रहती है।
॥ हर हर महादेव ॥


गुरु प्रदोष पर जपने योग्य मंत्र

शिव पंचाक्षरी मंत्र (सर्वसिद्धि के लिए)
ॐ नमः शिवाय

महामृत्युंजय मंत्र (आरोग्य और मोक्ष के लिए)
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥

बृहस्पति बीज मंत्र (गुरु दोष शांति के लिए)
ॐ बृं बृहस्पतये नमः

बृहस्पति स्तोत्र मंत्र (विद्या, शत्रु विनाश के लिए)
देवानाञ्च ऋषीणाञ्च गुरुं काञ्चनसन्निभम्।
बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम्॥

शिव गायत्री मंत्र
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि।
तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥

यहाँ पढ़ें - प्रदोष स्तोत्रम


गुरु प्रदोष व्रत: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

गुरु प्रदोष व्रत 2026 में कब है? गुरु प्रदोष व्रत 2026 में 8 अक्टूबर, गुरुवार को है। त्रयोदशी तिथि 7 अक्टूबर की रात 11:16 बजे शुरू होकर 8 अक्टूबर की रात 10:15 बजे समाप्त होगी।

प्रदोष काल में पूजा का सबसे उत्तम समय कौन सा है? 8 अक्टूबर 2026 को प्रदोष काल सायं 5:59 बजे से रात 8:27 बजे तक रहेगा। इसी अवधि में भगवान शिव का अभिषेक और पूजा करना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

गुरु प्रदोष व्रत का पारण कब करें? व्रत का पारण अगले दिन 9 अक्टूबर 2026 को सूर्योदय के पश्चात करें। पारण से पूर्व शिवलिंग पर जल और बेलपत्र अर्पित करें।

गुरु प्रदोष और सामान्य प्रदोष में क्या अंतर है? जब प्रदोष व्रत गुरुवार को पड़े तो उसे गुरु प्रदोष कहते हैं। इस दिन भगवान शिव के साथ बृहस्पति देव की भी कृपा प्राप्त होती है, जिससे ज्ञान, बुद्धि और समृद्धि का विशेष लाभ मिलता है।

गुरु प्रदोष व्रत में किन चीजों का दान करें? गुरु प्रदोष व्रत में पीले वस्त्र, हल्दी, चने की दाल, केला और सोने का दान शुभ माना जाता है। ब्राह्मणों को भोजन और दक्षिणा देना भी पुण्यदायी है।

गुरु प्रदोष व्रत में क्या खाना चाहिए? गुरु प्रदोष व्रत में दिनभर फलाहार करें। साबूदाना, दूध, फल, कुट्टू का आटा और मेवे ग्रहण किए जा सकते हैं। अनाज, प्याज, लहसुन और तामसिक भोजन वर्जित है। व्रत का पारण 9 अक्टूबर को सूर्योदय के बाद करें।

गुरु प्रदोष व्रत में कौन से मंत्र जपें? ॐ नमः शिवाय का 108 बार जप करें। बृहस्पति बीज मंत्र ॐ बृं बृहस्पतये नमः का जप करें। महामृत्युंजय मंत्र और बृहस्पति स्तोत्र का पाठ भी करें।

आश्विन कृष्ण पक्ष में गुरु प्रदोष का क्या महत्व है? आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में पितृ पक्ष का माहौल रहता है और इस समय पितर भी प्रसन्न होते हैं। आश्विन कृष्ण त्रयोदशी पर गुरु प्रदोष का संयोग शिव कृपा और पितृ तृप्ति दोनों का लाभ एक साथ देता है।

गुरु प्रदोष व्रत किसे विशेष रूप से करना चाहिए? जिनकी कुंडली में गुरु अस्त, नीच या पापग्रस्त हो, जो संतान, विवाह या शिक्षा में बाधाओं से पीड़ित हों, या जिनके जीवन में शत्रुओं का भय हो, उनके लिए यह व्रत विशेष फलदायी है।


॥ त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव। त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम देव देव ॥

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