रवि प्रदोष व्रत 22 नवंबर 2026: कार्तिक प्रदोष काल, पूजा विधि, कथा और मंत्र
Ravi Pradosh Vrat Date 2026: रवि प्रदोष व्रत 22 नवंबर 2026 में कब है?
प्रदोष व्रत हर मास की त्रयोदशी तिथि को संध्याकाल में भगवान शिव की आराधना के लिए रखा जाता है। जब यह त्रयोदशी रविवार को पड़े, तो उसे रवि प्रदोष कहते हैं। शिव को सूर्य का अधिष्ठाता माना गया है, इसलिए रवि प्रदोष पर शिव-सूर्य का यह संयोग आरोग्य, यश और दीर्घायु के लिए अत्यंत फलदायी है। कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी पर यह व्रत और भी पुण्यकारी हो जाता है।
रवि प्रदोष व्रत 2026: 22 नवंबर, रविवार | त्रयोदशी: 22 नवंबर प्रातः 4:56 बजे से 23 नवंबर प्रातः 2:36 बजे तक | प्रदोष काल: सायं 5:25 से रात्रि 8:06 बजे तक | कार्तिक शुक्ल पक्ष

इस वर्ष रवि प्रदोष व्रत रविवार, 22 नवंबर 2026 को कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को पड़ रहा है। त्रयोदशी तिथि का आरंभ 22 नवंबर को प्रातः 4:56 बजे होगा और समापन 23 नवंबर को प्रातः 2:36 बजे होगा। प्रदोष काल का शुभ मुहूर्त सायं 5:25 बजे से रात्रि 8:06 बजे तक रहेगा, इसी अवधि में शिव पूजन और रुद्राभिषेक करना श्रेयस्कर है। व्रत का पारण 23 नवंबर को सूर्योदय के पश्चात करें। आइए जानते हैं इस व्रत का महत्व, पूजा विधि और व्रत कथा।
ध्यान रखें: उपरोक्त समय भारतीय मानक समय (IST) पर आधारित हैं। सटीक जानकारी के लिए अपने स्थानीय पंचांग अवश्य देखें।
रवि Pradosh Vrat Ka Mahatva: रवि प्रदोष व्रत का महत्व जाने
भगवान शिव की आराधना के लिए संध्याकाल का प्रदोष समय सभी कालों में श्रेष्ठ माना गया है। स्कन्द पुराण में लिखा है कि त्रयोदशी के इस प्रदोष काल में शिव स्वयं प्रसन्न मुद्रा में होते हैं और भक्त की सुनते हैं।
जब यह तिथि रविवार को पड़े, तो सूर्य और शिव का दुर्लभ संयोग बनता है। सूर्य आरोग्य, तेज और दीर्घ आयु के कारक हैं। रवि प्रदोष पर भगवान शिव के उस स्वरूप की आराधना होती है जो सूर्य की भाँति समस्त संसार को ऊर्जा देता है। शिव पुराण के अनुसार इस व्रत को करने से नेत्र रोग, त्वचा रोग और दीर्घकालिक व्याधियाँ दूर होती हैं। जो व्यक्ति जीवन में घोर दरिद्रता और कष्टों से घिरा हो, उसके लिए यह व्रत शिव की करुणा का द्वार खोलता है। कार्तिक मास की शुक्ल त्रयोदशी पर यह व्रत करने से इसका फल और भी गहरा होता है, क्योंकि कार्तिक मास स्वयं ही शिव को अत्यंत प्रिय है।
Ravi Pradosh Vrat Puja Vidhi: रवि प्रदोष व्रत की पूजा विधि
- रवि प्रदोष व्रत के दिन क्या करें: सूर्योदय से पूर्व उठें, स्नान करें और लाल या केसरिया वस्त्र धारण करें। प्रातःकाल सूर्य देव को जल और लाल पुष्प से अर्घ्य दें। रवि प्रदोष पर यह विशेष शुभ है।
- व्रत संकल्प: हाथ में जल और लाल पुष्प लेकर भगवान शिव से आरोग्य, यश, नेत्र रोग शांति और दरिद्रता निवारण के लिए व्रत का संकल्प करें।
- रवि प्रदोष व्रत के दिन क्या खाएं या पिएं: दिनभर फलाहार करें। दूध, फल, मखाने, साबूदाना और सिंघाड़े का आटा ग्रहण किए जा सकते हैं। अन्न, प्याज, लहसुन और मांसाहार वर्जित है।
- व्रत के नियम: दिनभर शिव-सूर्य का स्मरण रखें। क्रोध और असत्य से बचें। दिन में सोना वर्जित है। किसी से विवाद न करें।
- प्रदोष काल की तैयारी: संध्या से एक घंटे पूर्व पुनः स्नान करें। पूजा सामग्री में दूध, दही, शहद, घी, बेलपत्र, श्वेत पुष्प, धतूरा, भस्म, चंदन, अक्षत, धूप और दीपक रखें।
- प्रदोष काल में पूजा: सायं 5:25 से 8:06 बजे के प्रदोष काल में शिवलिंग पर पंचामृत और दूध से अभिषेक करें। बेलपत्र, श्वेत पुष्प, धतूरा और चंदन अर्पित करें।
- मंत्र जाप: ॐ नमः शिवाय का 108 बार जप करें। महामृत्युंजय मंत्र और सूर्य गायत्री मंत्र का पाठ करें। प्रदोष स्तोत्रम का पाठ करें।
- व्रत कथा: पूजा के बाद रवि प्रदोष व्रत की कथा का श्रवण करें। दरिद्र ब्राह्मण की कथा शिव के करुणामय स्वरूप का प्रमाण है।
- दान: रविवार को गेहूँ, गुड़, लाल वस्त्र या ताँबे का दान शुभ है। इससे सूर्य ग्रह की कृपा और स्वास्थ्य लाभ होता है।
- पारण: अगले दिन 23 नवंबर को सूर्योदय के पश्चात पहले सूर्य को अर्घ्य दें, फिर सात्विक भोजन से व्रत तोड़ें।
Ravi Pradosh Vrat Katha: रवि प्रदोष व्रत की कथा

प्राचीन काल में एक गाँव में अत्यंत दीन ब्राह्मण रहता था। घर में न पर्याप्त अन्न था, न वस्त्र, न कोई सुविधा। किंतु उस घर की गृहलक्ष्मी भगवान शंकर के प्रदोष व्रत को अटूट निष्ठा से करती थी। एक दिन ब्राह्मण का पुत्र गंगा स्नान के लिए निकला। रास्ते में चोरों ने उसे पकड़ लिया और धन के लिए धमकी दी। बालक ने सरलता से कहा कि उसके पास माँ की बनाई रोटी है, और कुछ नहीं। चोरों ने उसे छोड़ दिया। आगे चलकर बालक थककर एक बरगद की छाया में सो गया। राजा के सिपाहियों ने उसे चोर समझकर पकड़ लिया और कारागार में डाल दिया।
उधर माँ की पीड़ा थी, परंतु उसका भरोसा भोलेनाथ पर था। उसी रात वह एकाग्र मन से प्रदोष व्रत करती रही। भगवान शिव से प्रार्थना करती रही कि चाहे जो हो, मेरे बालक की रक्षा करो। और सच में भोलेनाथ ने सुना। उसी रात राजा को स्वप्न आया कि वह बालक निर्दोष है। प्रातःकाल राजा ने बालक को मुक्त किया, सारा वृतान्त सुना और ब्राह्मण दंपति को बुलवाया। उनकी दरिद्रता देखकर राजा का हृदय भर आया और उसने उन्हें पाँच गाँव दान में दिए।
भगवान शिव की करुणा उन पर सबसे पहले बरसती है जो दरिद्र हैं, किंतु आस्था में धनी हैं।
एक सच्चे भक्त की पुकार शिव कभी अनसुनी नहीं करते।
उस दिन के बाद से उस ब्राह्मण परिवार में दरिद्रता का नाम नहीं रहा। शिव की कृपा से वे सुख और आनंद से जीवन बिताने लगे। ब्राह्मण पत्नी जीवनभर कृतज्ञ भाव से प्रदोष व्रत करती रही।
जो श्रद्धालु दरिद्रता या कष्ट में भी शिव का स्मरण नहीं छोड़ता,
भगवान शिव उसके जीवन को दरिद्रता से निकालकर समृद्धि की ओर ले जाते हैं।
रवि प्रदोष व्रत पर जपने योग्य मंत्र
पंचाक्षरी मंत्र (सर्वसिद्धि के लिए)
ॐ नमः शिवाय
महामृत्युंजय मंत्र (आरोग्य और मोक्ष के लिए)
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
सूर्य गायत्री मंत्र (रवि प्रदोष पर विशेष, आरोग्य और यश के लिए)
ॐ भास्कराय विद्महे महादित्याय धीमहि।
तन्नो आदित्यः प्रचोदयात्॥
आदित्यहृदयम् (प्रथम श्लोक — पृष्ठभूमि)
ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्।
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्॥
शिव गायत्री मंत्र
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि।
तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥
यहाँ पढ़ें - प्रदोष स्तोत्रम
रवि प्रदोष व्रत: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
रवि प्रदोष व्रत नवंबर 2026 में कब है?
रवि प्रदोष व्रत रविवार, 22 नवंबर 2026 को है। त्रयोदशी तिथि 22 नवंबर को प्रातः 4:56 बजे आरंभ होगी और 23 नवंबर को प्रातः 2:36 बजे समाप्त होगी। प्रदोष काल सायं 5:25 से रात्रि 8:06 बजे तक है।
रवि प्रदोष पर सूर्य को अर्घ्य क्यों देते हैं?
रविवार सूर्य देव का वार है और शिवजी का एक स्वरूप मार्तण्ड भी सूर्य से संबंधित है। रवि प्रदोष पर प्रातः सूर्य को जल और लाल पुष्प से अर्घ्य देना और सायं प्रदोष काल में शिवलिंग का अभिषेक करना — दोनों मिलकर इस व्रत को पूर्ण बनाते हैं। यह नेत्र रोग, त्वचा रोग और यश की प्राप्ति के लिए विशेष है।
कार्तिक के रवि प्रदोष का विशेष महत्व क्यों है?
कार्तिक मास सभी मासों में श्रेष्ठ माना गया है। इस मास में की गई पूजा-पाठ का फल कई गुना होता है। प्रबोधिनी एकादशी के ठीक बाद आने वाला यह रवि प्रदोष कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी का पुण्य भी लेकर आता है, जिससे इस व्रत का महत्व और बढ़ जाता है।
प्रदोष व्रत में क्या खा सकते हैं?
प्रदोष व्रत में दिनभर फलाहार करें। दूध, फल, मखाने, साबूदाना और सिंघाड़े का आटा ग्रहण कर सकते हैं। अन्न, लहसुन, प्याज और मांसाहार वर्जित है। पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद करें।
रवि प्रदोष और शुक्र प्रदोष में कौन अधिक शुभ है?
दोनों प्रदोषों का अपना विशेष महत्व है। रवि प्रदोष स्वास्थ्य, यश और सरकारी कार्यों के लिए विशेष है, जबकि शुक्र प्रदोष सौभाग्य, वैवाहिक सुख और संतान के लिए। दोनों भगवान शिव की कृपा दिलाते हैं — अपनी कामना के अनुसार व्रत करें।
रवि प्रदोष व्रत किसे विशेष रूप से करना चाहिए?
जो लोग नेत्र रोग, त्वचा रोग या दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित हों, जिन्हें सरकारी या न्यायिक कार्यों में बाधा हो, या जो यश और प्रतिष्ठा की चाहत रखते हों, उनके लिए रवि प्रदोष विशेष फलदायी है।
रवि प्रदोष व्रत में क्या दान करें?
रविवार को गेहूँ, गुड़, तांबे के बर्तन, लाल वस्त्र या सोने का दान शुभ है। किसी नेत्रहीन को सहायता करना या किसी रोगी की सेवा करना इस दिन विशेष पुण्यदायी है।
रवि प्रदोष व्रत में कौन से मंत्र जपें?
ॐ नमः शिवाय का 108 बार जप करें। सूर्य गायत्री मंत्र ॐ भास्कराय विद्महे महादित्याय धीमहि तन्नो आदित्यः प्रचोदयात् का जप करें। महामृत्युंजय मंत्र और प्रदोष स्तोत्रम का पाठ भी फलदायी है।
काल हर, कष्ट हर, दुख हर, सर्व रोग हर, नमः पार्वती पतये, हर हर महादेव ॥


