🙏 ॥ जय गणेशाय नमः ॥ 🙏

वासुदेव गणेश चतुर्थी व्रत 22 मार्च

Vasudeva Ganesh Chaturthi व्रत कब है: कब है चैत्र वासुदेव विनायक चतुर्थी?

हिन्दू पंचांग के अनुसार वासुदेव चतुर्थी का व्रत चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को किया जाता है। इस पावन दिन को चैत्र वासुदेव विनायक चतुर्थी तथा मनोरथ चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। भगवान गणेश विघ्नहर्ता एवं प्रथम पूज्य है, इसलिए इस तिथि का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। पंचांग गणना के अनुसार वर्ष 2026 में चतुर्थी तिथि का आरंभ 21 मार्च की रात्रि 11 बजकर 56 मिनट से होगा और इसका समापन 22 मार्च की रात्रि 9 बजकर 16 मिनट पर होगा। व्रत और पूजा के लिए उदया तिथि (सूर्योदय के समय विद्यमान तिथि) को मान्यता दी जाती है, इसलिए यह व्रत 22 मार्च 2026, रविवार के दिन रखा जाएगा।

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वासुदेव चतुर्थी व्रत का धार्मिक महत्व

वासुदेव चतुर्थी व्रत विद्यार्थीयो, व्यापारीयो, गृहस्थो तथा नवीन कार्य आरम्भ करने वालो व्यक्तियों के लिये अतयंत फलदायी माना जाता है। महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान तथा कर्णाटक आदि राज्यों में यह व्रत बहुत श्रद्धा और विधिपूर्वक मनाया जाता है। यह व्रत करने से व्यक्ति के जीवन के आने वाले सारे विघ्न दूर होते है और सभी प्रकारो की रुकावटे से मुक्ति मिलती है। इस दिन भगवान गणेश जी की की पूजा से सफलता और समृद्धि प्राप्त होती है।

वासुदेव चतुर्थी व्रत की पूजा विधि:

  • वासुदेव चतुर्थी व्रत के दिन प्रातः ब्रह्ममुहूर्त या सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना चाहिए एवं स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिऐ ।
  • व्रत का संकल्प लेते हुए भगवान गणेश की उपासना करने का निश्चय करें। श्रद्धा अनुसार निर्जल व्रत, फलाहार या सामान्य उपवास रखा जा सकता है।
  • पूजा के लिए आवश्यक सामग्री पहले से तैयार रखें, जैसे - गणेश जी की मूर्ति या चित्र, दीपक, धूप या अगरबत्ती, पंचामृत, फल, मिष्ठान्न (विशेष रूप से मोदक और लड्डू), दूर्वा, पुष्प, चंदन, अक्षत (चावल) एवं अन्य पूजन सामग्र।
  • पूजा प्रारंभ करते समय गणेश जी की मूर्ति को स्वच्छ करें और चंदन अर्पित करें। इसके बाद पंचामृत से अभिषेक कर शुद्ध जल से स्नान कराएं।
  • दीप प्रज्वलित करें और धूप, पुष्प तथा दूर्वा अर्पित करते हुए श्रद्धापूर्वक पूजन करें। इसके साथ ही फल और मिठाइयों का भोग लगाएं।
  • पूजा के दौरान गणेश मंत्रों का जप करना अत्यंत शुभ माना जाता ह। यह मंत्र विघ्नहर्ता गणेश का ध्यान करते हुए जपा जाता है।

‘ॐ गं गणपतये नमः’

  • पूजा के अंत में भगवान गणेश की आरती करें और उनसे सुख-समृद्धि एवं विघ्नों की निवृत्ति की प्रार्थना करें।
  • व्रत को पूर्ण करने के लिए व्रत कथा का श्रवण या पाठ अवश्य करें, क्योंकि इसे व्रत की पूर्णता का महत्वपूर्ण भाग माना गया है।
  • भगवान गणेश की आरती अवश्य करें और गणेश आरती भी पढ़ें, जिससे पूजा पूर्ण मानी जाती है तथा भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

वासुदेव चतुर्थी पर जरूर पढ़ें यह व्रत कथा

प्राचीन काल में एक बार भगवान शिव और माता पार्वती नर्मदा नदी के तट पर विराजमान थे। शांत वातावरण में माता पार्वती ने मनोरंजन के लिए भगवान शिव से चौपड़ खेलने की इच्छा व्यक्त की। शिव जी ने उनकी बात स्वीकार कर ली, लेकिन यह प्रश्न उठ खड़ा हुआ कि खेल में जीत और हार का निर्णय कौन करेगा। तब भगवान शिव ने आसपास की घास से एक बालक की आकृति बनाई और उसमें चेतना स्थापित कर उसे साक्षी के रूप में खड़ा कर दिया।

खेल प्रारंभ हुआ और माता पार्वती ने लगातार कई बार विजय प्राप्त की। जब उस बालक से परिणाम बताने को कहा गया, तो उसने भ्रमवश भगवान शिव को विजेता घोषित कर दिया। यह सुनकर माता पार्वती अत्यंत क्रोधित हो गईं और उन्होंने बालक को श्राप दे दिया कि वह लाचार होकर कीचड़ में पड़ा रहेगा। श्राप मिलते ही बालक ने अत्यंत विनम्रता से क्षमा याचना की और कहा कि उससे यह भूल अनजाने में हुई है।

बालक की विनती सुनकर माता पार्वती का हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने उसे सांत्वना देते हुए कहा कि समय आने पर उसका कष्ट अवश्य दूर होगा। माता पार्वती ने उसे बताया कि भविष्य में कुछ दिव्य नागकन्याएं वहां आएंगी और वे उसे भगवान गणेश के व्रत का महत्व समझाएंगी। यदि वह श्रद्धा और नियमपूर्वक विनायक चतुर्थी का व्रत करेगा, तो वह सभी दुखों से मुक्त हो जाएगा।

कुछ समय बाद नागकन्याएं वहां आईं और उन्होंने बालक को विधिपूर्वक गणेश व्रत करने की प्रक्रिया बताई। बालक ने पूरे विश्वास और भक्ति के साथ व्रत का पालन किया। उसकी सच्ची श्रद्धा से प्रसन्न होकर भगवान गणेश ने उसे श्राप से मुक्त कर दिया और उसे पुनः स्वस्थ एवं सुखी जीवन प्रदान किया। इस प्रकार यह व्रत मनुष्य के जीवन से विघ्नों को दूर कर सुख-समृद्धि प्रदान करने वाला माना गया है।

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