🙏 ॥ जय गणेशाय नमः ॥ 🙏

कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी 2026: 3 जुलाई व्रत तिथि, पूजा विधि और व्रत कथा

Krishnapingala Sankashti Chaturthi Vrat Date 2026: कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी 3 जुलाई 2026

संकष्टी गणेश चतुर्थी का व्रत हर मास कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को भगवान गणपति की आराधना के लिए रखा जाता है। इस दिन व्रती सूर्योदय से चंद्रोदय तक उपवास करते हैं और चंद्रदर्शन के बाद अर्घ्य देकर व्रत पूर्ण करते हैं।

कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी 2026: 3 जुलाई, शुक्रवार | चतुर्थी तिथि: 3 जुलाई प्रातः 11:20 बजे से 4 जुलाई रात्रि 12:39 बजे तक | चंद्रोदय: 3 जुलाई रात्रि 9:54 बजे | आषाढ़ कृष्ण पक्ष

कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी 2026 - गणेश पूजा, दूर्वा और मोदक का भोग

इस बार संकष्टी व्रत आषाढ़ मास की कृष्ण पक्ष चतुर्थी को पड़ रहा है, इसलिए इसे कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी कहते हैं। व्रत की तिथि शुक्रवार, 3 जुलाई 2026 है। चतुर्थी तिथि 3 जुलाई को प्रातः 11:20 बजे आरंभ होगी और 4 जुलाई को रात्रि 12:39 बजे समाप्त होगी। चंद्रोदय 3 जुलाई को रात्रि 9:54 बजे होगा। व्रत का पारण उसी रात चंद्रदर्शन के पश्चात चंद्रमा को जल, दूध या गंगाजल का अर्घ्य देकर करें। आइए जानते हैं इस व्रत का महत्त्व, सम्पूर्ण पूजा विधि और व्रत कथा

ध्यान रखें: भौगोलिक स्थिति के कारण भारत के अलग-अलग स्थानों में चंद्रोदय का समय अलग हो सकता है। सटीक जानकारी के लिए अपने स्थानीय पंचांग जरूर देखें।


कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी का महत्व

प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहते हैं और इस दिन भगवान गणेश की विशेष आराधना की जाती है। आषाढ़ मास की कृष्ण पक्ष चतुर्थी को कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है, क्योंकि इस दिन गणेश जी के कृष्णपिंगल स्वरूप की उपासना होती है।

भगवान गणेश विघ्नहर्ता हैं, सभी संकटों को हरने वाले। संकष्टी का अर्थ ही है विपत्तियों से उद्धार। जो भक्त इस दिन सूर्योदय से चंद्रोदय तक उपवास रखता है, गणेश जी की षोडशोपचार पूजा करता है और चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत तोड़ता है, उसके जीवन के समस्त विघ्न दूर होते हैं। श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को इस व्रत की महिमा बताते हुए कहा था कि कृष्णपिंगल चतुर्थी का व्रत करने वाले व्यक्ति को संतान, धन और सफलता, तीनों की प्राप्ति होती है, चाहे वह गृहस्थ हो या संन्यासी। इस दिन दूर्वा, मोदक और लाल पुष्प अर्पित करने से गणेश जी की कृपा शीघ्र मिलती है। महर्षि लोमश के अनुसार इस व्रत का फल सुनने मात्र से ही संकट टल जाते हैं और जीवन के अवरुद्ध मार्ग खुलने लगते हैं। इस एक व्रत में संतान-प्राप्ति, दारिद्र्य-नाश और शत्रु-पराजय तीनों के आशीर्वाद छुपे हैं।


Krishnapingala Sankashti Chaturthi Vrat Puja Vidhi: कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत की पूजा विधि

  • व्रत के दिन (3 जुलाई) ब्रह्ममुहूर्त में उठें, स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें और भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। मन में गणेश जी का स्मरण करते हुए दिन भर व्रत का संकल्प लें।
  • सूर्योदय से चंद्रोदय तक उपवास रखें। फलाहार, दूध और जल ग्रहण किया जा सकता है। चावल, गेहूँ, उड़द दाल, प्याज, लहसुन और तामसिक भोजन इस व्रत में पूर्णतः वर्जित हैं। शरीर को शुद्ध रखना ही इस व्रत की नींव है।
  • पूजा की तैयारी में लाल पुष्प, दूर्वा, मोदक, पंचामृत, चंदन, अक्षत, धूप और घी का दीपक रखें। दूर्वा के बिना गणेश पूजन अधूरा है, इसलिए इक्कीस या अधिक दूर्वा दल अवश्य लाएं।
  • षोडशोपचार पूजन करें: आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और प्रदक्षिणा के क्रम से गणेश जी की पूजा करें। मोदक का भोग अवश्य लगाएं क्योंकि यह गणेश जी का प्रिय नैवेद्य है।
  • गणेश मंत्र का 108 बार जप करें। ॐ गं गणपतये नमः और ॐ एकदंताय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि तन्नो दंती प्रचोदयात् का पाठ इस दिन विशेष फलदायी है। रुद्राक्ष या लाल चंदन की माला से जप करना उत्तम रहता है।
  • कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा का पाठ या श्रवण अवश्य करें। महर्षि लोमश के अनुसार इस कथा को सुनने मात्र से संकट टल जाते हैं। कथा के बाद गणेश आरती करें और प्रसाद परिवार में बाँटें।
  • संध्याकाल में चंद्रोदय का इंतजार करें। चंद्रमा के दर्शन के बाद जल में दूध, चंदन और अक्षत मिलाकर अर्घ्य दें। अर्घ्य देते समय गणेश जी का स्मरण करें और संकट-निवारण की प्रार्थना करें।
  • व्रत के नियम: प्रदोष काल में निद्रा न लें। क्रोध, कटु वचन और व्यर्थ वाद-विवाद से दूरी बनाए रखें। पूरे दिन मन को शांत और विचारों को सात्विक रखें। पूजा में नीले या काले वस्त्र पहनने से बचें, लाल या पीले वस्त्र श्रेयस्कर हैं।
  • चंद्रोदय के पश्चात अर्घ्य देने के बाद ही व्रत तोड़ें। किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन और वस्त्र का दान करें। यह दान व्रत के फल को कई गुना बढ़ा देता है और गणेश जी की कृपा परिवार पर स्थायी होती है।
  • अगले दिन (4 जुलाई) प्रातःकाल स्नान के बाद गणेश जी का संक्षिप्त स्मरण करते हुए सात्विक भोजन से व्रत का पारण करें। यदि कथा श्रवण व्रत के दिन न हो सका, तो पारण के दिन भी कथा पढ़ना उतना ही पुण्यफल देता है।

Krishnapingala Sankashti Chaturthi Vrat Katha: कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत की कथा

भगवान गणेश की पूजा करते भक्त, कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा चित्र

एक बार माता पार्वती ने भगवान गणेश से पूछा, “पुत्र, आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी का क्या महत्व है? इस दिन गणेश के किस स्वरूप की पूजा होती है और व्रत कैसे किया जाता है?” भगवान गणेश ने माँ को प्रणाम करते हुए कहा, “माँ, यह प्रश्न कभी युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा था। मैं वही उत्तर आपको सुनाता हूँ।” श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया था कि आषाढ़ कृष्ण चतुर्थी को गणेश जी का कृष्णपिंगल स्वरूप पूजित होता है। इस दिन जो भक्त श्रद्धापूर्वक व्रत करता है और ब्राह्मणों को भोजन तथा वस्त्र दान करता है, उसे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विजय मिलती है।

॥ श्री गणेशाय नमः ॥

तब गणेश जी ने माँ पार्वती को महर्षि लोमश की कथा सुनाई। महिष्मती नगरी में एक धर्मपरायण राजा था जिसके कोई संतान नहीं थी। राजा और रानी सुदक्षिणा दोनों इस दुख से व्यथित रहते थे। राज्य की प्रजा भी चिंतित थी कि उत्तराधिकारी के बिना राज्य का क्या होगा। एक दिन नगर के नागरिक महर्षि लोमश के आश्रम पहुँचे और उनसे राजा की पीड़ा बताई। महर्षि ने शांत भाव से सुनकर कहा, “हे भक्तजनों, ध्यान से सुनो। मैं एक महान संकट-नाशन व्रत बताता हूँ। आषाढ़ मास की कृष्ण चतुर्थी को भगवान गणेश के कृष्णपिंगल स्वरूप की पूजा करो। विधिपूर्वक व्रत करो और ब्राह्मणों को भोजन तथा वस्त्र का दान करो। गणेश जी की कृपा से तुम्हारे राजा को शीघ्र पुत्र की प्राप्ति होगी।” महर्षि के वचन सुनकर सभी नागरिक हाथ जोड़कर उठे, प्रणाम किया और महिष्मती लौट गए।

विघ्नहर्ता का स्मरण जब सच्चे मन से होता है,
तो संसार की कोई भी बाधा टिक नहीं पाती।

नागरिकों ने राजा को सारा वृत्तांत सुनाया। राजा प्रसन्न हुए और उन्होंने रानी सुदक्षिणा के साथ कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी का व्रत विधिपूर्वक किया। उन्होंने गणेश जी को दूर्वा, मोदक और लाल पुष्प अर्पित किए, रात्रि में चंद्रोदय के बाद अर्घ्य दिया और ब्राह्मणों को भोजन व वस्त्र का दान किया। भगवान गणेश की कृपा शीघ्र फलीभूत हुई। कुछ समय पश्चात रानी सुदक्षिणा ने एक सुंदर और तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। पूरे राज्य में उत्सव मनाया गया। राजा ने ऋषि लोमश के पास जाकर कृतज्ञता प्रकट की।

॥ श्री गणेशाय नमः ॥

जो भक्त कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी को श्रद्धापूर्वक व्रत रखता है और यह कथा सुनता या पढ़ता है,
उसके जीवन के समस्त संकट दूर होते हैं और भगवान गणेश की कृपा सदा बनी रहती है।


कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत में जपे ये मंत्र

॥ जय गणेशाय नमः ॥

पूजा आरंभ से पहले

श्री वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

मूल बीज मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः ॥

इस मंत्र का 108 बार जाप रुद्राक्ष या हल्दी की माला पर करें।

विघ्ननाशक मंत्र
ॐ गं गौं गणपतये विघ्न विनाशिने स्वाहा ॥

चंद्र अर्घ्य मंत्र
गगनार्णवमाणिक्य चन्द्र दाक्षायणीपते।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं गणेशप्रतिरूपक ॥

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कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत जुलाई 2026 में कब है? कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत शुक्रवार, 3 जुलाई 2026 को है। चतुर्थी तिथि 3 जुलाई को प्रातः 11:20 बजे आरंभ होगी और 4 जुलाई को रात्रि 12:39 बजे समाप्त होगी।

व्रत का पारण कब करें? पारण 3 जुलाई की रात्रि 9:54 बजे चंद्रोदय के बाद करें। पहले चंद्रमा को जल, दूध या गंगाजल से अर्घ्य दें, फिर सात्विक भोजन से व्रत खोलें। चंद्रदर्शन से पहले पारण करना उचित नहीं है।

संकष्टी चतुर्थी व्रत में क्या खाएं? व्रत में फलाहार करें। ताजे फल, दूध, दही, साबूदाना खिचड़ी, मखाना और मूंगफली ली जा सकती हैं। प्याज, लहसुन, अनाज और मांसाहार पूरी तरह वर्जित है।

गणेश जी को कौन सा भोग लगाएं? मोदक और तिल के लड्डू इस व्रत का विशेष भोग हैं। नारियल, गुड़, फल और दूर्वा भी अर्पित करें।


॥ गणपति बप्पा मोरया, मंगलमूर्ति मोरया 🙏॥

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