🙏 ॥ जय गणेशाय नमः ॥ 🙏

प्रद्युम्न विनायक चतुर्थी 2026: तिथि, मुहूर्त, व्रत कथा

Pradyumna Vinayak Chaturthi Vrat Date 2026: प्रद्युम्न विनायक चतुर्थी व्रत 2026 में कब है?

प्रत्येक मास की शुक्ल पक्ष चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहा जाता है और प्रथम पूज्य भगवान गणेश जी इसके आराध्य देव हैं। साल में बारह विनायक चतुर्थी आती हैं, जिनमें ज्येष्ठ मास की चतुर्थी को प्रद्युम्न विनायक चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। प्रद्युम्न शब्द का अर्थ ज्ञान का प्रकाश है, इसलिए इस दिन ज्ञानमुद्रा धारण किए हुए गणपति का पूजन किया जाता है। शास्त्रों में हर मास की चतुर्थी के लिए गणेश जी का एक विशेष रूप बताया गया है, और ज्येष्ठ मास के लिए यह स्वरूप प्रद्युम्न गणेश का है।

प्रद्युम्न विनायक चतुर्थी 2026: 18 जून, गुरुवार | चतुर्थी तिथि: 17 जून रात 9:38 बजे से 18 जून शाम 6:58 बजे तक | ज्येष्ठ महीने, शुक्ल पक्ष

स्वर्ण सिंहासन पर बैठे भगवान गणेश और मूषक, प्रद्युम्न विनायक चतुर्थी व्रत का चित्रण

साल 2026 में प्रद्युम्न विनायक चतुर्थी व्रत गुरुवार, 18 जून को रखा जाएगा। चतुर्थी तिथि 17 जून की रात्रि 9 बजकर 38 मिनट से आरम्भ होकर 18 जून को सायं 6 बजकर 58 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार चतुर्थी 18 जून को सूर्योदय के समय विद्यमान रहती है, इसलिए व्रत इसी दिन रखा जाएगा। पूजा के लिए मध्याह्न काल सबसे उपयुक्त माना गया है। इस दिन शुभ मुहूर्त प्रातः 10 बजकर 58 मिनट से दोपहर 1 बजकर 30 मिनट तक रहेगा। इसी अवधि में गणेश पूजन करना फलदायी रहता है। व्रत का पारण चन्द्रोदय के बाद किया जाता है। चन्द्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही, जल, दूध या गंगाजल के साथ, व्रती भोजन ग्रहण कर सकते हैं। इस दिन चन्द्र दर्शन प्रातः 8 बजकर 44 मिनट से रात्रि 10 बजकर 28 मिनट तक वर्जित माना गया है, इस अवधि में चन्द्रमा देखने से बचना चाहिए। आइए जानते हैं प्रद्युम्न विनायक चतुर्थी का महत्व, पूजा विधि और व्रत कथा के बारे में।

ध्यान रखें: भौगोलिक स्थिति के कारण भारत के अलग-अलग स्थानों में सूर्योदय और सूर्यास्त का समय अलग हो सकता है। इसलिए सटीक जानकारी के लिए अपने स्थानीय पंचांग या खगोलीय विवरण जरूर देखें।


प्रद्युम्न विनायक चतुर्थी का महत्व

प्रद्युम्न शब्द का अर्थ ज्ञान का प्रकाश है, इसलिए इस दिन गणपति की आराधना ज्ञानमुद्रा वाले स्वरूप में की जाती है। पुराणों में हर मास की चतुर्थी के साथ गणेश जी के बारह स्वरूपों का वर्णन मिलता है, और ज्येष्ठ मास का यह स्वरूप बुद्धि की उस ज्योति का प्रतिनिधित्व करता है जो अज्ञान के अंधकार को मिटाती है। जिस तरह सूर्य की किरणें घने कुहासे को छांट देती हैं, उसी तरह प्रद्युम्न गणेश की उपासना मन में फैले संदेह और भ्रम को दूर करने वाली मानी गई है।

इस व्रत को करने वाले साधक के जीवन में स्थिरता, एकाग्रता और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है। विद्यार्थियों के लिए यह दिन विशेष फलदायी बताया गया है, क्योंकि गणेश जी विद्या और बुद्धि दोनों के अधिष्ठाता देवता हैं। गृहस्थ जीवन में भी इस व्रत को करने से घर में सुख शांति बनी रहती है और कार्यों में आने वाली बाधाएं स्वयं शांत होने लगती हैं। यही कारण है कि सनातन परंपरा में हर मास की चतुर्थी को अलग अलग नाम और महत्व देकर गणेश आराधना को निरंतर बनाए रखा गया है।


Pradyumna Vinayak Chaturthi Vrat Puja Vidhi: प्रद्युम्न विनायक चतुर्थी व्रत की पूजा विधि

  • व्रत वाले दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और स्वच्छ या पीले वस्त्र धारण करें, क्योंकि गणपति पूजन में पीला रंग शुभ माना जाता है।
  • घर के पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें और एक चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर भगवान गणेश की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
  • मध्याह्न मुहूर्त में पूजा आरंभ करें, क्योंकि चतुर्थी तिथि में गणेश पूजन के लिए यही समय सबसे उपयुक्त बताया गया है।
  • सबसे पहले गणपति का आवाहन करें और जल, अक्षत तथा फूल चढ़ाकर उन्हें आसन पर प्रतिष्ठित करें।
  • दूर्वा, लाल फूल और मोदक का भोग गणेश जी को अर्पित करें, क्योंकि दूर्वा और मोदक दोनों उन्हें विशेष प्रिय माने जाते हैं।
  • धूप और दीप प्रज्वलित करके गणेश मंत्रों का जाप करें और मन को शांत रखते हुए श्रद्धा भाव से पूजन करें।
  • पूजा के अंत में गणेश आरती करें और परिवार के सभी सदस्य मिलकर आरती में भाग लें।
  • इस दिन प्रद्युम्न विनायक चतुर्थी की व्रत कथा सुनना या पढ़ना अवश्य करें, क्योंकि कथा श्रवण के बिना व्रत अधूरा माना जाता है।
  • दिनभर सात्विक भोजन करें और संभव हो तो फलाहार व्रत रखें, साथ ही क्रोध और वाद विवाद से दूर रहने का प्रयास करें।
  • इस दिन तुलसी पत्र गणेश जी को न चढ़ाएं, क्योंकि शास्त्रों में इसका निषेध बताया गया है।
  • तिथि समाप्त होने के बाद ही फलाहार या भोजन ग्रहण करें और व्रत का पारण सायं काल में चतुर्थी तिथि पूर्ण होने पर करें।
  • अगले दिन प्रातः पुनः गणपति का स्मरण करें और यथासंभव दान या ब्राह्मण भोजन कराकर व्रत का समापन करें।

Pradyumna Vinayak Chaturthi Katha: प्रद्युम्न विनायक चतुर्थी व्रत की कथा

नदी तट पर भगवान गणेश की पूजा करते भक्त, प्रद्युम्न विनायक चतुर्थी व्रत 2026

प्राचीन समय की बात है, एक दिन भगवान शिव और माता पार्वती नर्मदा नदी के तट पर बैठे थे। वातावरण शांत था और समय बिताने के लिए माता पार्वती ने भोलेनाथ से चौपड़ खेलने का आग्रह किया। शिव जी सहमत हो गए, परंतु खेल आरंभ होते ही एक समस्या सामने आई। दोनों के अतिरिक्त वहां कोई ऐसा नहीं था जो हार जीत का साक्षी बन सके। तब महादेव ने कुछ तिनके और मिट्टी एकत्र करके एक बालक की प्रतिमा बनाई और उसमें प्राण डाल दिए। उस बालक को निर्णायक की भूमिका दी गई और खेल शुरू हुआ।

जय गणेशाय नमः

संयोग या दैव इच्छा से तीन बार खेले गए चौपड़ में हर बार माता पार्वती ही विजयी रहीं। जब अंतिम में परिणाम बताने की बारी आई, तो उस बालक ने भूलवश शिव जी को विजयी और पार्वती जी को पराजित घोषित कर दिया। यह सुनकर माता पार्वती को क्रोध आ गया। उन्होंने बालक को श्राप दिया कि वह लंगड़ा हो जाए और वहीं कीचड़ में पड़ा रहकर कष्ट भोगे। बालक ने हाथ जोड़कर अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी, क्योंकि उसने जो देखा वही सत्य कह दिया था।

जो सत्य देखा, वही कहा, फिर भी दंड मिला
यही जीवन की वह परीक्षा है जिसे श्रद्धा और क्षमा ही पार कराती है

माता का हृदय करुणा से भर गया और उन्होंने बालक से कहा कि नागकन्याएं वहां से गुजरेंगी और गणेश पूजन करेंगी, उनसे विनती करने पर ही श्राप से मुक्ति संभव होगी।

जय गणेशाय नमः

समय बीतने पर वैसा ही हुआ। नागकन्याओं ने वहां विधिपूर्वक गणेश चतुर्थी का व्रत किया और बालक को भी इस व्रत में सम्मिलित कर लिया। श्रद्धा और नियम से किए गए इस पूजन के प्रभाव से बालक का कष्ट दूर हो गया और वह पूर्ववत स्वस्थ हो गया।

तभी से यह मान्यता चली आ रही है कि चतुर्थी के दिन सच्चे मन से गणेश आराधना करने पर हर विघ्न और कष्ट का नाश होता है।
यही कथा आज भी प्रद्युम्न विनायक चतुर्थी के व्रत में सुनी जाती है।


प्रद्युम्न विनायक चतुर्थी व्रत में जपे ये मंत्र

॥ जय गणेशाय नमः ॥

पूजा आरंभ से पहले

श्री वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

पूजा के आरंभ में इसका पाठ करें। इसका अर्थ है कि हे टेढ़ी सूंड वाले, विशाल काय, करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशमान भगवान गणेश, मेरे सभी कार्यों में सदा विघ्नों को दूर करें।

मूल बीज मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः ॥

इस मंत्र का 108 बार जाप रुद्राक्ष या हल्दी की माला पर करें। यह गणेश जी का सबसे सिद्ध बीज मंत्र है।

विघ्ननाशक मंत्र

ॐ गं गौं गणपतये विघ्न विनाशिने स्वाहा ॥

द्वादश नाम स्तोत्र (विघ्न शमन हेतु)

गणपतिर्विघ्नराजो लम्बतुण्डो गजाननः।
द्वैमातुरश्च हेरम्ब एकदन्तो गणाधिपः॥
विनायकश्चारुकर्णः पशुपालो भवात्मजः।
द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्॥

इन बारह नामों का प्रातः उठकर पाठ करने से समस्त विघ्न शांत होते हैं, ऐसी मान्यता है।

यहाँ पढ़ें - Ganesh Aarti


प्रद्युम्न विनायक चतुर्थी व्रत: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

प्रद्युम्न विनायक चतुर्थी व्रत 2026 में कब है? प्रद्युम्न विनायक चतुर्थी व्रत 2026 में गुरुवार, 18 जून को रखा जाएगा। चतुर्थी तिथि 17 जून की रात्रि 9 बजकर 38 मिनट से आरम्भ होकर 18 जून को सायं 6 बजकर 58 मिनट तक रहेगी।

इसे प्रद्युम्न विनायक चतुर्थी क्यों कहा जाता है? प्रद्युम्न शब्द का अर्थ ज्ञान का प्रकाश है। ज्येष्ठ मास की चतुर्थी पर गणेश जी का यह स्वरूप ज्ञानमुद्रा धारण किए हुए पूजा जाता है, इसलिए इसे प्रद्युम्न विनायक चतुर्थी कहा जाता है।

प्रद्युम्न विनायक चतुर्थी पर पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है? इस दिन पूजा के लिए मध्याह्न काल सबसे उपयुक्त माना गया है। शुभ मुहूर्त प्रातः 10 बजकर 58 मिनट से दोपहर 1 बजकर 30 मिनट तक रहेगा।

व्रत का पारण कब किया जाता है? व्रत का पारण चन्द्रोदय के बाद किया जाता है। चन्द्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही, जल, दूध या गंगाजल के साथ, व्रती भोजन ग्रहण कर सकते हैं।

प्रद्युम्न विनायक चतुर्थी व्रत में कौन सी कथा सुनी जाती है? इस व्रत में भगवान शिव और माता पार्वती के चौपड़ खेल से जुड़ी कथा सुनी जाती है, जिसमें एक बालक को मिले श्राप और गणेश पूजन से उसकी मुक्ति का वर्णन है। यही कथा गणेश चतुर्थी की पारंपरिक कथाओं में भी प्रचलित है।

इस दिन गणेश जी को कौन सी वस्तुएं अर्पित करनी चाहिए? इस दिन गणेश जी को दूर्वा, लाल फूल और मोदक का भोग अर्पित करना चाहिए, क्योंकि यह दोनों उन्हें विशेष प्रिय माने जाते हैं।

क्या इस दिन चन्द्र दर्शन करना चाहिए? नहीं, चतुर्थी तिथि में चन्द्र दर्शन को अशुभ माना गया है। शाम के समय चन्द्रमा देखने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे मिथ्या दोष लगने की मान्यता है।

प्रद्युम्न विनायक चतुर्थी व्रत में कौन सा मंत्र सबसे महत्वपूर्ण है? इस व्रत में ॐ गं गणपतये नमः गणेश जी का सबसे सिद्ध बीज मंत्र माना जाता है। इसका 108 बार जाप रुद्राक्ष या हल्दी की माला पर करना शुभ रहता है।

क्या इस दिन व्रत रखने पर कोई विशेष नियम का पालन करना चाहिए? हां, इस दिन सात्विक भोजन करना चाहिए और संभव हो तो फलाहार व्रत रखना चाहिए। साथ ही गणेश जी को तुलसी पत्र न चढ़ाएं और क्रोध तथा वाद विवाद से दूर रहने का प्रयास करें।


twitter facebook telegram whatsapp