🙏 ॥ जय गणेशाय नमः ॥ 🙏

विघ्नराज अंगारकी संकष्टी 2026: 29 सितंबर तिथि, पूजा विधि, कथा और मंत्र

Vighnaraja Angarki Sankashti Chaturthi Vrat Date 2026: 29 सितंबर 2026 - विघ्नराज अंगारकी संकष्टी चतुर्थी व्रत 2026 में कब है?

आश्विन कृष्ण चतुर्थी पर विघ्नराज गणेश का व्रत रखा जाता है। विघ्नराज अर्थात विघ्नों के स्वामी, जो शेषनाग पर विराजमान होकर भक्तों के समस्त संकट हरते हैं। इस वर्ष यह चतुर्थी मंगलवार को है, इसलिए यह अंगारकी संकष्टी है। “अंगारक” मंगल का संस्कृत नाम है और यह दुर्लभ संयोग वर्ष में 2 से 4 बार होता है, पुण्य की दृष्टि से यह 12 साधारण संकष्टियों के बराबर फल देता है।

विघ्नराज अंगारकी संकष्टी 2026: 29 सितंबर, मंगलवार | चतुर्थी तिथि: 29 सितंबर सायं 5:10 से 30 सितंबर दोपहर 2:55 तक | चंद्रोदय: दिल्ली 7:39, उज्जैन 7:56, मुंबई 8:20 बजे | आश्विन कृष्ण पक्ष

विघ्नराज अंगारकी संकष्टी 2026 व्रत: भगवान गणपति की पूजा

व्रत मंगलवार, 29 सितंबर 2026 को है। आश्विन कृष्ण चतुर्थी 29 सितंबर को सायं 5:10 बजे लगती है और 30 सितंबर को दोपहर 2:55 बजे समाप्त होती है। 29 सितंबर की शाम तिथि लगते ही उसी रात चंद्रोदय होता है, इसलिए चंद्रोदय-तिथि नियम से व्रत 29 सितंबर को मान्य है। चंद्रमा दिल्ली में 7:39, उज्जैन में 7:56 और मुंबई में 8:20 बजे उगेगा। अपने शहर के अनुसार समय देखें और चंद्रदर्शन के बाद तांबे के पात्र में जल या गंगाजल से चंद्रदेव को अर्घ्य देकर व्रत खोलें। आइए जानते हैं विघ्नराज अंगारकी का महत्त्व, पूजा विधि और व्रत कथा

ध्यान रखें: भौगोलिक स्थिति के कारण भारत के अलग-अलग स्थानों में चंद्रोदय का समय अलग हो सकता है। सटीक जानकारी के लिए अपने स्थानीय पंचांग जरूर देखें।


विघ्नराज अंगारकी संकष्टी चतुर्थी का महत्व

वर्ष में जब भी कृष्ण पक्ष की चतुर्थी मंगलवार को पड़े, उसे अंगारकी संकष्टी कहते हैं। मंगल ग्रह की अग्नि-ऊर्जा और गणेश जी की बुद्धि-शक्ति का यह संयोग बारह सामान्य संकष्टी के बराबर फल देता है। यह गणेश पुराण का स्पष्ट वचन है। इस बार यह संयोग आश्विन मास में बना है, जब विघ्नराज गणेश की पूजा होती है।

मुद्गल पुराण के सप्तम स्कन्ध में विघ्नराज अवतार का पूरा आख्यान है। विघ्नराज वे हैं जो ममता (आसक्ति) रूपी विघ्न को उखाड़ फेंकते हैं। उनका वाहन शेषनाग है, जो समभाव का प्रतीक है, क्योंकि शेषनाग उस पर रखे पूरे ब्रह्मांड का बोझ बिना किसी आसक्ति के उठाए रहते हैं। जिस व्यक्ति के जीवन में बार-बार बाधाएं आती हों, कार्य बिगड़ते हों, संबंधों में खिंचाव हो, उसे इस अंगारकी पर विघ्नराज की आराधना करनी चाहिए। यह व्रत मंगल दोष की शांति के लिए भी अत्यंत कारगर माना गया है। चंद्रोदय पर अर्घ्य देकर व्रत खोलने से गणपति और चंद्र दोनों की कृपा एक साथ मिलती है, जो जीवन के हर क्षेत्र में ममता और अहंकार से उत्पन्न रुकावटों को हटाती है।


Vighnaraja Angarki Sankashti Vrat Puja Vidhi: विघ्नराज अंगारकी संकष्टी व्रत की पूजा विधि

  • 29 सितंबर को ब्रह्ममुहूर्त में उठें, स्नान कर लाल वस्त्र पहनें। अंगारकी संकष्टी मंगलवार को पड़ती है, इसलिए लाल रंग का विशेष महत्व है।
  • व्रत का संकल्प लें: आज मैं विघ्नराज अंगारकी संकष्टी चतुर्थी का व्रत भगवान गणपति की आराधना के लिए रखता/रखती हूं।
  • उत्तर-पूर्व कोण में चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें।
  • पूजा सामग्री तैयार रखें: शुद्ध जल, गंगाजल, रोली, लाल चंदन, सिंदूर, अक्षत, 21 दूर्वा की गांठें, लाल पुष्प, घी का दीपक, धूप, कपूर, नारियल, 21 मोदक, तिल के लड्डू और मौसमी फल।
  • दीपक और धूप जलाएं। गणपति को जल से आचमन कराएं, फिर अक्षत, रोली, लाल चंदन, सिंदूर, 21 दूर्वा और लाल फूल क्रम से अर्पित करें।
  • भोग में 21 मोदक रखें। गुड़, नारियल और फल भी अर्पित कर सकते हैं।
  • ॐ विघ्नराजाय नमः और ॐ गं गणपतये नमः का 108 बार जप करें। अंगारकी होने से मंगल बीज मंत्र का जप भी करें।
  • संध्याकाल में पुनः पूजन करें। विघ्नराज अंगारकी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें, फिर गणेश आरती करें।
  • रात्रि में चंद्रोदय पर खुले आकाश में जाएं (दिल्ली 7:39, उज्जैन 7:56, मुंबई 8:20)। तांबे के पात्र में जल, दूध या गंगाजल लेकर चंद्रमा की ओर मुख करके अर्घ्य अर्पित करें।
  • अर्घ्य के बाद गणपति से प्रार्थना कर सात्विक भोजन से व्रत खोलें। फल, खीर या हल्का घर का खाना उचित है।
  • क्या न करें: प्याज, लहसुन, मांसाहार और नशा वर्जित है। तुलसी न चढ़ाएं। चंद्रोदय से पहले व्रत न तोड़ें।

Vighnaraja Angarki Sankashti Vrat Katha: विघ्नराज अंगारकी संकष्टी व्रत की कथा

विघ्नराज अंगारकी संकष्टी व्रत कथा

मुद्गल पुराण के सप्तम स्कन्ध में ममासुर की उत्पत्ति की अद्भुत कथा है। एक बार माता पार्वती अपनी सखियों के साथ हिमालय के एक वन-कुंज में विश्राम कर रही थीं। सखियों ने हँसते हुए कहा कि जब शिवजी ध्यान से जागेंगे तो कैलाश पर कोई नहीं मिलेगा उनको। माता पार्वती उस क्षण अपने पति का स्मरण करके जोर से हँस पड़ीं। उस दिव्य हास्य से एक विशाल और तेजस्वी पुरुष प्रकट हुआ। उसने विनम्रता से पूछा: “माता, मैं क्या करूँ?” पार्वती ने ममता से कहा: “तुम मेरे हो।” इसीलिए उसका नाम ‘मम’ पड़ा।

॥ ॐ विघ्नराजाय नमः ॥

पार्वती ने मम को निर्देश दिया कि वह गणेश का षडाक्षर मंत्र जपे और सत्य के मार्ग पर चले। किंतु वन में जाते हुए मम का सामना महाबली शंभरासुर से हुआ। शंभरासुर ने उसे बहला-फुसलाकर असुर-शिक्षा दिलाई। मम ने गणेश की उपासना छोड़ दी और दानव-विद्याएँ सीख लीं। शंभरासुर ने अपनी पुत्री मोहिनी का विवाह उससे कराया और उसे ‘ममासुर’ नाम मिला। ममासुर ने अपनी ‘निर्मम्पुरी’ नाम की राजधानी बसाई और फिर तीनों लोकों पर आक्रमण किया। इन्द्र, वैकुण्ठ, सत्यलोक, कैलाश, कोई नहीं बचा। त्रिमूर्ति तक को बंदी बनाया।

देवता व्याकुल होकर गणेश जी के पास पहुँचे। गणेश जी ने पहले नारद के द्वारा ममासुर को शांति का संदेश भेजा, पर उसने अहंकार में उसे ठुकरा दिया। तब गणेश जी ने विघ्नराज रूप धारण किया, शेषनाग पर आरूढ़, शांत किंतु अजेय। युद्धभूमि में विघ्नराज ने एक सुगंधित कमल फेंका। उस दिव्य सुगंध से ममासुर और उसकी सेना मूर्च्छित हो गई। उसके पुत्र धर्म और अधर्म दोनों परास्त हो गए। जब ममासुर को होश आया, तो उसने गणेश जी के चरण पकड़ लिए। विघ्नराज ने उसे क्षमा किया और पाताल लोक को भेज दिया। देवता अपने-अपने लोकों में लौट गए, और धर्म की पुनर्स्थापना हुई।

ममता, यानी ‘यह मेरा है’ की भावना, ही सबसे बड़ा विघ्न है।
विघ्नराज की शरण में आने पर यह ममता टूटती है और जीवन में स्वतंत्रता आती है।

जो भक्त इस अंगारकी संकष्टी को श्रद्धापूर्वक व्रत रखता है और यह कथा सुनता है,
उसके जीवन की ममता और मोह से उत्पन्न बाधाएं दूर होती हैं, मंगल दोष भी शांत होता है।
॥ विघ्नराज गणपतये नमः ॥


विघ्नराज अंगारकी संकष्टी पर जपने योग्य मंत्र

॥ जय गणेशाय नमः ॥

विघ्नराज नाम मंत्र

ॐ विघ्नराजाय नमः ॥

विघ्नराज स्तुति (मुद्गल पुराण, खण्ड ७)

नमस्ते विघ्नराजाय भक्तविघ्नविदारण।
अभक्तेभ्यो विशेषेण विघ्नदात्रे नमो नमः ॥
गणेशाय परेशाय हेरम्बाय नमो नमः।
चतुर्बाहुधरायैव नागेशध्वजिने नमः ॥

मूल बीज मंत्र (गणपत्यथर्वशीर्ष)

ॐ गं गणपतये नमः ॥

मंगल बीज मंत्र (अंगारकी संकष्टी के लिए)

ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः ॥

गणेश गायत्री मंत्र

ॐ एकदन्ताय विद्महे।
वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥

विघ्ननाशक मंत्र

ॐ गं गौं गणपतये विघ्न विनाशिने स्वाहा ॥

पूजा आरंभ श्लोक

श्री वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

चंद्रोदय अर्घ्य मंत्र

गगनार्णवमाणिक्य चन्द्र दाक्षायणीपते।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं गणेशप्रतिरूपक ॥

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विघ्नराज अंगारकी संकष्टी व्रत: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

विघ्नराज अंगारकी संकष्टी 2026 में कब है? विघ्नराज अंगारकी संकष्टी चतुर्थी मंगलवार, 29 सितंबर 2026 को है। चतुर्थी तिथि 29 सितंबर को सायं 5:10 बजे आरंभ होगी और 30 सितंबर को दोपहर 2:55 बजे समाप्त होगी।

अंगारकी संकष्टी क्या होती है? जब कृष्ण पक्ष की चतुर्थी मंगलवार को पड़ती है तो उसे अंगारकी संकष्टी कहते हैं। अंगारक मंगल का ही संस्कृत नाम है। यह संयोग वर्ष में 2 से 4 बार होता है और इसका पुण्य 12 साधारण संकष्टियों के बराबर माना गया है।

चंद्रोदय का समय क्या है? 29 सितंबर 2026 को चंद्रोदय: दिल्ली में 7:39 बजे, उज्जैन में 7:56 बजे और मुंबई में 8:20 बजे। अन्य शहरों में यह समय भिन्न हो सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग देखें।

विघ्नराज संकष्टी क्यों कहते हैं? आश्विन मास की कृष्ण पक्ष चतुर्थी पर गणेश जी के विघ्नराज स्वरूप की पूजा होती है। विघ्नराज अर्थात विघ्नों के राजा, जो स्वयं विघ्न हरते हैं और भक्तों के रास्ते की बाधाएं दूर करते हैं।

अंगारकी संकष्टी पर क्या भोग लगाएं? 21 मोदक और तिल के लड्डू विशेष भोग हैं। लाल रंग की मिठाई, नारियल, केला, गुड़ और 21 दूर्वा की गांठें अर्पित करें। लाल पुष्प और लाल चंदन का भी महत्व है।

मंगल दोष में अंगारकी संकष्टी का क्या लाभ है? अंगारकी संकष्टी पर गणेश पूजा और मंगल बीज मंत्र ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः का जप करने से मंगल दोष की तीव्रता घटती है। गणपति और मंगल की संयुक्त उपासना जीवन के विघ्नों और अवरोधों को दूर करती है।

अंगारकी संकष्टी पर कौन सा मंत्र जपें? ॐ गं गणपतये नमः का 108 बार जप करें। अंगारकी चतुर्थी पर मंगल बीज मंत्र ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः का जप भी करें। यह दोहरा संयोग विशेष फलदायी है।


॥ गणपति बप्पा मोरया, मंगलमूर्ति मोरया ॥

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