🙏 ॥ जय गणेशाय नमः ॥ 🙏

अखूरथ संकष्टी चतुर्थी 2026: 26 दिसंबर तिथि, पूजा विधि, कथा और मंत्र

Akhuratha Sankashti Chaturthi Vrat Date 2026: 26 दिसंबर 2026 - अखूरथ संकष्टी चतुर्थी व्रत 2026 में कब है?

पौष कृष्ण चतुर्थी पर गणेश जी के अखूरथ स्वरूप का पूजन होता है। “अखूरथ” का अर्थ है जिनका वाहन मूषक है। जैसे मूषक हर छोटी-बड़ी बाधा को कुतरकर रास्ता बना देता है, वैसे ही गणपति भक्त के जीवन के विघ्नों को काटते हैं। पौष मास की यह शीतकालीन संकष्टी मन और तन में स्थिरता और शांति लाती है।

अखूरथ संकष्टी चतुर्थी 2026: 26 दिसंबर, शनिवार | चतुर्थी तिथि: 26 दिसंबर रात्रि 8:05 से 27 दिसंबर सायं 5:13 तक | चंद्रोदय: 26 दिसंबर रात्रि 8:48 बजे | पौष कृष्ण पक्ष

अखूरथ संकष्टी चतुर्थी 2026 व्रत: गणेश पूजा

व्रत शनिवार, 26 दिसंबर 2026 को है। पौष कृष्ण चतुर्थी 26 दिसंबर को रात्रि 8:05 बजे लगती है और 27 दिसंबर को सायं 5:13 बजे समाप्त होती है। 26 दिसंबर को रात्रि 8:05 बजे तिथि लगते ही 8:48 बजे चंद्रोदय होता है, उस समय चतुर्थी चल रही होती है, इसलिए चंद्रोदय-तिथि नियम से व्रत 26 दिसंबर को ही मान्य है। चंद्रमा दिखने पर जल, दूध या गंगाजल से अर्घ्य देकर व्रत का पारण करें। आइए जानते हैं अखूरथ संकष्टी का महत्त्व, पूजा विधि और क्रौंच मूषक की व्रत कथा

ध्यान रखें: भौगोलिक स्थिति के कारण भारत के अलग-अलग स्थानों में चंद्रोदय का समय अलग हो सकता है। सटीक जानकारी के लिए अपने स्थानीय पंचांग जरूर देखें।


अखूरथ संकष्टी चतुर्थी का महत्व

अखूरथ अर्थात जिनका रथ मूषक है। संस्कृत में “अखु” का अर्थ मूषक और “रथ” का अर्थ वाहन है। गणेश जी का यह नाम पौष कृष्ण चतुर्थी से जुड़ा है, जब उन्होंने क्रौंच नामक अहंकारी गन्धर्व को वश में कर अपना वाहन बनाया था। इस कथा का सूत्र गणेश पुराण और मत्स्य पुराण दोनों में मिलता है। मूषक केवल वाहन नहीं है, वह उस प्रवृत्ति का प्रतीक है जो हर छोटी बाधा को, हर रेशे को, धीरे-धीरे कुतरकर रास्ता बना लेती है। जो अहंकार पर्वत जैसा बड़ा था, वह गणपति के पाश में आते ही मूषक जैसा लघु हो गया।

पौष मास शीत ऋतु का गहन काल है। इस समय मन की वृत्तियाँ स्थिर होती हैं और ध्यान की गहराई बढ़ती है। इसीलिए इस मास में किया गया व्रत और उपासना कई गुना अधिक फलदायी होती है। तिल का भोग इस मास में गणेश जी को अत्यंत प्रिय है क्योंकि तिल शीत में तन को उष्णता देता है और गणपति इस मास में तिल-मोदक से प्रसन्न होते हैं। धर्म सिंधु में इस व्रत को परिवार के कलह और संकट को हरने का उत्तम उपाय बताया गया है। जो भक्त पौष की इस संकष्टी पर विधिपूर्वक व्रत रखता है, उसके जीवन के वे विघ्न दूर होते हैं जो बार-बार आकर उसे पीछे खींचते हैं।


Akhuratha Sankashti Chaturthi Vrat Puja Vidhi: अखूरथ संकष्टी चतुर्थी व्रत की पूजा विधि

  • 26 दिसंबर को सूर्योदय से पूर्व उठें, स्नान कर लाल या पीले वस्त्र पहनें।
  • व्रत का संकल्प लें: आज अखूरथ संकष्टी चतुर्थी को मैं सूर्योदय से चंद्रोदय तक भगवान गणेश की आराधना के लिए उपवास रखता/रखती हूं।
  • उत्तर-पूर्व दिशा में चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें।
  • पूजा सामग्री तैयार रखें: शुद्ध जल, गंगाजल, रोली, चंदन, सिंदूर, अक्षत, 21 दूर्वा की गांठें, लाल व पीले फूल, घी का दीपक, धूप, कपूर, नारियल, मोदक और तिल के लड्डू।
  • दीपक और धूप जलाएं। गणपति को जल से आचमन कराएं, फिर अक्षत, रोली, चंदन, सिंदूर, 21 दूर्वा और लाल पुष्प क्रम से अर्पित करें।
  • भोग में मोदक और तिल के लड्डू रखें। गुड़ और नारियल भी अर्पित कर सकते हैं।
  • ॐ अखूरथाय नमः और ॐ गं गणपतये नमः का 108 बार जप करें।
  • संध्याकाल में पुनः पूजन करें। अखूरथ संकष्टी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें, फिर गणेश आरती करें।
  • रात्रि 8:48 बजे चंद्रोदय पर खुले आकाश में जाएं। तांबे के पात्र में जल, दूध या गंगाजल लेकर चंद्रमा की ओर मुख करके अर्घ्य अर्पित करें।
  • अर्घ्य के बाद गणपति से प्रार्थना कर सात्विक भोजन से व्रत खोलें। फल, खीर या हल्का घर का खाना उचित है।
  • क्या न करें: प्याज, लहसुन, मांसाहार और नशा वर्जित है। तुलसी न चढ़ाएं। चंद्रोदय से पहले व्रत न तोड़ें।

Akhuratha Sankashti Chaturthi Vrat Katha: अखूरथ संकष्टी चतुर्थी व्रत की कथा

अखूरथ संकष्टी चतुर्थी कथा

गणेश पुराण में क्रौंच की कथा विस्तार से मिलती है। देवराज इन्द्र की सभा में एक बार क्रौंच नाम का गन्धर्व उपस्थित था। क्रौंच अपनी संगीत-विद्या पर बहुत गर्व करता था। इन्द्र ने उसे पुकारा। जल्दबाज़ी में आगे बढ़ते हुए क्रौंच का पैर वामदेव ऋषि के पैर पर पड़ गया। महर्षि वामदेव ने क्षुब्ध होकर शाप दिया: “तुम मूषक बन जाओ।” क्रौंच घबरा गया और ऋषि से क्षमा माँगी। ऋषि का क्रोध शांत हुआ तो उन्होंने कहा: “एक दिन तुम गणेश जी के वाहन बनोगे और देवता तुम्हारे समक्ष नमन करेंगे।”

॥ ॐ अखूरथाय नमः ॥

शाप लगते ही क्रौंच पृथ्वी पर गिरा और विशाल मूषक बन गया, पर्वत के समान ऊँचा, भारी और विध्वंसकारी। उसने खेत उजाड़े, गोशालाएँ रौंदीं, आश्रमों का अन्न नष्ट किया। एक दिन वह महर्षि पराशर के आश्रम तक पहुँचा, जहाँ उस समय बालरूप में गणेश जी विराजमान थे। क्रौंच ने आश्रम में हाहाकार मचाया। वृक्ष उखड़े, भंडार खाली हो गए, ऋषि चिंतित हो गए।

गणेश जी ने महर्षि को अभय दिया और अपना पाश फेंककर उस विशाल मूषक को जकड़ लिया। क्रौंच ने छटपटाया, आकाश तक उछला, गोते लगाए। पर गणेश जी का पाश नहीं छूटा। तब गणेश जी उसके ऊपर बैठ गए। क्रौंच की रीढ़ चरमरा गई। उसने नम्रता से गणेश जी से कहा: “प्रभु, मैं आपका भार नहीं सह सकता, कुछ हल्के हो जाइए।” गणेश जी मुस्काए और कहा: “जब तक तुम मेरे वाहन बनकर सेवा में रहोगे, मैं उतना ही भार रखूँगा जितना तुम सह सको।” क्रौंच ने प्रसन्न होकर स्वीकार किया। तब से क्रौंच, जो कभी अहंकार से पर्वत जितना बड़ा था, गणपति का प्रिय मूषक वाहन बन गया और गणेश जी के ध्वज पर भी उसका चिह्न अंकित हुआ।

अहंकार में जो पर्वत बन जाता है, वह गणपति के पाश में आते ही मूषक हो जाता है।
और जो मूषक बनकर सेवा करे, वह गणपति के ध्वज पर स्थान पाता है।

जो भक्त पौष की इस अखूरथ संकष्टी पर यह कथा श्रद्धा से सुनता है,
उसके भीतर का अहंकार और मन की जड़ता दूर होती है, गणपति की कृपा निरंतर बनी रहती है।
॥ अखूरथ गणपतये नमः ॥


अखूरथ संकष्टी चतुर्थी पर जपने योग्य मंत्र

॥ जय गणेशाय नमः ॥

अखूरथ नाम मंत्र

ॐ अखूरथाय नमः ॥

गणेश द्वादशनाम स्तोत्र (पद्म पुराण, सृष्टिखण्ड)

गणपतिर्विघ्नराजो लम्बतुण्डो गजाननः।
द्वैमातुरश्च हेरम्ब एकदन्तो गणाधिपः ॥
विनायकश्चारुकर्णः पशुपालो भवात्मजः।
द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत् ॥

मूल बीज मंत्र (गणपत्यथर्वशीर्ष)

ॐ गं गणपतये नमः ॥

गणेश गायत्री मंत्र

ॐ एकदन्ताय विद्महे।
वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥

विघ्ननाशक मंत्र

ॐ गं गौं गणपतये विघ्न विनाशिने स्वाहा ॥

पूजा आरंभ श्लोक

श्री वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

चंद्रोदय अर्घ्य मंत्र

गगनार्णवमाणिक्य चन्द्र दाक्षायणीपते।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं गणेशप्रतिरूपक ॥

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अखूरथ संकष्टी चतुर्थी व्रत: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

अखूरथ संकष्टी चतुर्थी दिसंबर 2026 में कब है? अखूरथ संकष्टी चतुर्थी शनिवार, 26 दिसंबर 2026 को है। चतुर्थी तिथि 26 दिसंबर को रात्रि 8:05 बजे आरंभ होगी और 27 दिसंबर को सायं 5:13 बजे समाप्त होगी।

चंद्रोदय का समय क्या है और व्रत कब खोलें? 26 दिसंबर 2026 को चंद्रोदय का अनुमानित समय रात्रि 8:48 बजे है। स्थान के अनुसार यह 8:26 से 8:52 बजे के बीच हो सकता है। चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही व्रत खोलें।

अखूरथ का क्या अर्थ है? अखूरथ संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है जिनका वाहन मूषक (चूहा) है। यह भगवान गणेश का एक विशेष नाम है। पौष कृष्ण चतुर्थी को गणेश जी के इसी स्वरूप की पूजा होती है।

संकष्टी चतुर्थी का व्रत कैसे रखते हैं? व्रती सूर्योदय से चंद्रोदय तक उपवास रखते हैं। चंद्रोदय के समय खुले आकाश में आकर चंद्रमा को अर्घ्य देते हैं और गणेश पूजन के बाद सात्विक भोजन से व्रत खोलते हैं।

अखूरथ गणेश को क्या भोग लगाएं? मोदक, तिल के लड्डू, गुड़, नारियल और मौसमी फल का भोग लगाएं। 21 दूर्वा की गांठें अर्पित करें। पौष मास में तिल के मोदक गणेश जी को विशेष प्रिय हैं।

पौष मास की संकष्टी का क्या विशेष महत्व है? पौष मास में शीत ऋतु के कारण मन में विशेष स्थिरता रहती है। इस समय किया गया व्रत और साधना फलदायी होती है। पौष संकष्टी पर तिल का भोग गणेश जी को विशेष प्रिय है।

संकष्टी व्रत में तुलसी क्यों नहीं चढ़ाते? पौराणिक कथा के अनुसार तुलसी और गणेश जी के बीच शाप का प्रसंग है, जिसके कारण गणेश पूजन में तुलसी वर्जित है। इसके स्थान पर दूर्वा और लाल पुष्प अर्पित करें।

अखूरथ संकष्टी पर कौन सा मंत्र जपें? ॐ अखूरथाय नमः यह अखूरथ गणेश का विशेष नाम मंत्र है। इसके साथ ॐ गं गणपतये नमः का 108 बार जप करें। गणेश गायत्री मंत्र का पाठ भी करें।


॥ गणपति बप्पा मोरया, मंगलमूर्ति मोरया ॥

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