🙏 ॥ जय गणेशाय नमः ॥ 🙏

कृच्छ्र विनायक चतुर्थी 2026: 13 दिसंबर, तिथि, मुहूर्त, पूजा विधि

Krichchhra Vinayak Chaturthi Vrat Date 2026: कृच्छ्र विनायक चतुर्थी 13 दिसंबर 2026

साल भर में 12 विनायक चतुर्थियां आती हैं, और मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पक्ष चतुर्थी कृच्छ्र विनायक चतुर्थी कहलाती है। स्कंद पुराण में इस व्रत का विस्तृत वर्णन मिलता है, विशेषकर राजा अजातशत्रु की कथा के माध्यम से। ‘कृच्छ्र’ का अर्थ है, कठिनाई से मुक्ति। जीवन में जब विघ्न और बाधाएं अत्यधिक हों, उस समय यह चतुर्थी उनके निवारण के लिए विशेष फलदायी मानी गई है।

कृच्छ्र विनायक चतुर्थी 2026: 13 दिसंबर, रविवार | चतुर्थी तिथि: 12 दिसंबर दोपहर 2:06 से 13 दिसंबर सायं 4:47 तक | मार्गशीर्ष महीने, शुक्ल पक्ष

कृच्छ्र विनायक चतुर्थी 2026, गणेश पूजा

इस वर्ष कृच्छ्र विनायक चतुर्थी रविवार, 13 दिसंबर 2026 को मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष में पड़ रही है। चतुर्थी तिथि का आरंभ 12 दिसंबर को दोपहर 2:06 बजे होगा और समापन 13 दिसंबर को सायं 4:47 बजे होगा। पूजा का शुभ मध्याह्न मुहूर्त 13 दिसंबर को प्रातः 11:27 बजे से दोपहर 1:39 बजे तक रहेगा। आइए जानते हैं इस व्रत का महत्व, पूजा विधि और व्रत कथा

ध्यान रखें: भौगोलिक स्थिति के कारण भारत के अलग-अलग स्थानों में पूजा मुहूर्त का समय थोड़ा भिन्न हो सकता है। सटीक जानकारी के लिए अपने स्थानीय पंचांग जरूर देखें।


कृच्छ्र विनायक चतुर्थी का महत्व जाने

गणेश पुराण और धर्मसिंधु में विनायक चतुर्थी का वर्णन विस्तार से मिलता है। भगवान गणेश प्रथम पूज्य हैं, किसी भी मंगल कार्य का आरंभ उनके स्मरण के बिना नहीं होता। मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्थी को विशेष रूप से ‘कृच्छ्र’ नाम दिया गया है क्योंकि इस दिन भगवान गणेश की आराधना करने से जीवन में आई कठिन-से-कठिन परिस्थितियों का भी समाधान मिलता है।

मार्गशीर्ष मास को भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में अपना प्रिय मास बताया है, “मासानां मार्गशीर्षोऽहम्”। इस मास में शुक्ल चतुर्थी का संयोग होने से गणेश पूजन का फल कई गुना बढ़ जाता है। इस दिन व्रत रखने, मोदक का भोग लगाने और 21 दूर्वा अर्पित करने से गणपति शीघ्र प्रसन्न होते हैं और साधक की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।


Krichchhra Vinayak Chaturthi Vrat Puja Vidhi: कृच्छ्र विनायक चतुर्थी की पूजा विधि

  • ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ पीले या लाल वस्त्र धारण करें, क्योंकि गणपति पूजन में ये रंग शुभ माने जाते हैं।
  • घर के पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें और उत्तर-पूर्व दिशा में चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर गणेश की मूर्ति स्थापित करें।
  • मध्याह्न मुहूर्त (11:27 AM से 1:39 PM) में पूजा आरंभ करें, क्योंकि कृच्छ्र विनायक की पूजा के लिए यही समय सर्वश्रेष्ठ है।
  • सबसे पहले गणपति का आवाहन करें और जल, अक्षत तथा फूल चढ़ाकर उन्हें आसन पर प्रतिष्ठित करें।
  • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गुड़) से गणपति को स्नान कराएं और लाल या पीले वस्त्र से उनका श्रृंगार करें।
  • 21 दूर्वा की गांठें, मोदक, तिल के लड्डू, नारियल, गुड़ और मौसमी फल गणेश जी को अर्पित करें, क्योंकि स्कंद पुराण में ये विशेष रूप से अनुशंसित हैं।
  • धूप और दीप प्रज्वलित करके ॐ कृच्छ्रहराय गणपतये नमः मंत्र का जाप करें और मन को शांत रखते हुए श्रद्धा भाव से पूजन करें।
  • पूजा के अंत में गणेश आरती करें और परिवार के सभी सदस्य मिलकर आरती में भाग लें।
  • इस दिन कृच्छ्र विनायक चतुर्थी की व्रत कथा (राजा अजातशत्रु की कथा) सुनना या पढ़ना अवश्य करें, क्योंकि कथा श्रवण के बिना व्रत अधूरा माना जाता है।
  • दिनभर सात्विक भोजन करें और संभव हो तो निर्जल व्रत रखें, साथ ही क्रोध और नकारात्मक विचारों से दूर रहने का प्रयास करें।
  • इस दिन तुलसी पत्र गणेश जी को न चढ़ाएं, क्योंकि शास्त्रों में इसका निषेध बताया गया है।
  • यह व्रत 4 वर्षों तक लगातार करने से विशेष फल मिलता है, चौथे वर्ष में पूर्ण निर्जल व्रत करें और उद्यापन समारोह करें।

Krichchhra Vinayak Chaturthi Vrat Katha: कृच्छ्र विनायक चतुर्थी की व्रत कथा

कृच्छ्र विनायक चतुर्थी कथा, राजा अजातशत्रु और योगशांति

स्कंद पुराण में महर्षि वशिष्ठ ने राजा दशरथ को यह कथा सुनाई थी। प्राचीन काल में काशी नरेश अजातशत्रु एक धर्मपरायण और विद्वान राजा थे। वे देवताओं और ब्राह्मणों का सम्मान करते थे, धर्म का पालन करते थे और प्रजा का पालन पिता की भांति करते थे। किंतु उनके मन में सदा एक अशांति रहती थी। सांसारिक सुख तो उन्हें प्राप्त थे, पर मन को वह योगशांति नहीं मिल रही थी जिसकी खोज में वे थे।

॥ ॐ गं गणपतये नमः ॥

एक दिन देवर्षि नारद राजा के दरबार में पधारे। अजातशत्रु ने उन्हें विधिपूर्वक आसन दिया और विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, “हे देवर्षि, मुझे वह उपाय बताइए जिससे मुझे योगशांति की प्राप्ति हो। मैं सांसारिक सुखों से परे जाकर मन की वास्तविक शांति चाहता हूं।” नारद जी प्रसन्न हुए और बोले, “राजन, तुम ब्रह्मणस्पति गणेश की आराधना करो। मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्थी को चतुर्थी व्रत करो। इस व्रत से मन में स्थिरता आती है और गणपति के साथ एकत्व का अनुभव होता है।” नारद जी ने आगे कहा, “जो चतुर्थी व्रत की उपेक्षा करता है, उसे आध्यात्मिक हानि होती है। किंतु जो इसे श्रद्धा से करता है, उसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों की प्राप्ति होती है। यहां तक कहा गया है कि चतुर्थी व्रत के बिना अन्य सभी व्रत निष्फल हो जाते हैं।”

गणपति की आराधना मन को स्थिर करती है।
जो मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्थी को गणेश पूजन करता है, उसे योगशांति की प्राप्ति होती है।

राजा अजातशत्रु ने नारद जी के उपदेश का पालन किया। मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्थी को उन्होंने मध्याह्न काल में गणपति का विधिपूर्वक पूजन किया। मोदक, दूर्वा और नारियल अर्पित किए। मन को एकाग्र करके गणेश मंत्र का जप किया। धीरे-धीरे उनके मन में शांति उतरने लगी। जो अशांति वर्षों से थी, वह समाप्त हो गई। उन्हें योगशांति की प्राप्ति हुई और गणपति की कृपा से उनका जीवन धन्य हो गया।

जो भक्त मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्थी को कृच्छ्र विनायक चतुर्थी का व्रत करता है,
उसके जीवन की सभी कठिनाइयाँ दूर होती हैं और मन को शांति मिलती है।
॥ श्री गणेशाय नमः ॥


कृच्छ्र विनायक चतुर्थी व्रत में जपे ये मंत्र

॥ जय गणेशाय नमः ॥

विनायक नाम मंत्र

ॐ विनायकाय नमः ॥

गणेश पञ्चरत्नम् (आदि शंकराचार्य)

मुदाकरात्तमोदकं सदा विमुक्तिसाधकं।
कलाधरावतंसकं विलासिलोकरक्षकम्।
अनायकैकनायकं विनाशितेभदैत्यकम्।
नताशुभाशुनाशकं नमामि तं विनायकम् ॥

मूल बीज मंत्र (गणपत्यथर्वशीर्ष)

ॐ गं गणपतये नमः ॥

गणेश गायत्री मंत्र

ॐ एकदन्ताय विद्महे।
वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ॥

विघ्ननाशक मंत्र

ॐ गं गौं गणपतये विघ्न विनाशिने स्वाहा ॥

पूजा आरंभ श्लोक

श्री वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

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कृच्छ्र विनायक चतुर्थी व्रत: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

कृच्छ्र विनायक चतुर्थी दिसंबर 2026 में कब है? कृच्छ्र विनायक चतुर्थी रविवार, 13 दिसंबर 2026 को है। चतुर्थी तिथि 12 दिसंबर को दोपहर 2:06 बजे आरंभ होगी और 13 दिसंबर को सायं 4:47 बजे समाप्त होगी। उदया-तिथि के अनुसार व्रत 13 दिसंबर को रखा जाएगा।

कृच्छ्र विनायक चतुर्थी का क्या महत्व है? मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्थी को कृच्छ्र विनायक चतुर्थी कहते हैं। ‘कृच्छ्र’ का अर्थ है कठिनाई से मुक्ति। इस दिन भगवान गणेश की पूजा करने से जीवन की कठिनाइयों और विघ्नों का नाश होता है और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

पूजा का शुभ मुहूर्त कब है? 13 दिसंबर को मध्याह्न पूजा मुहूर्त प्रातः 11:27 बजे से दोपहर 1:39 बजे तक रहेगा। इसी समय विनायक पूजन करना सर्वोत्तम है।

कृच्छ्र विनायक चतुर्थी व्रत में कौन सी कथा सुनी जाती है? इस व्रत में राजा अजातशत्रु की कथा सुनी जाती है जिसमें देवर्षि नारद द्वारा कृच्छ्र विनायक चतुर्थी का महत्व बताया गया है। राजा ने इस व्रत से योगशांति की प्राप्ति की।

विनायक चतुर्थी और संकष्टी चतुर्थी में क्या अंतर है? विनायक चतुर्थी शुक्ल पक्ष की चतुर्थी होती है और इसमें मध्याह्न में पूजन का विधान है। संकष्टी चतुर्थी कृष्ण पक्ष की चतुर्थी है और उसमें चंद्रोदय के बाद व्रत खोलते हैं।

कृच्छ्र विनायक चतुर्थी व्रत में कौन सा मंत्र सबसे महत्वपूर्ण है? इस व्रत में ॐ कृच्छ्रहराय गणपतये नमः कृच्छ्र विनायक का विशेष मंत्र माना जाता है। साथ ही ॐ गं गणपतये नमः बीज मंत्र का 108 बार जाप भी विशेष फलदायी है।

विनायक चतुर्थी पर गणेश जी को क्या भोग लगाएं? मोदक, तिल के लड्डू, नारियल, गुड़ और मौसमी फल का भोग लगाएं। 21 दूर्वा की गांठें और लाल पुष्प विशेष रूप से प्रिय हैं। तुलसी कभी न चढ़ाएं।

क्या विनायक चतुर्थी पर चंद्रमा को देखना वर्जित है? भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी (गणेश चतुर्थी) पर चंद्र दर्शन वर्जित रहता है। अन्य विनायक चतुर्थियों पर यह प्रतिबंध नहीं है।


॥ गणपति बप्पा मोरया, मंगलमूर्ति मोरया ॥

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