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वरदा विनायक चतुर्थी व्रत 2026 - तिथि, पूजा विधि, कथा और मंत्र | Varda Vinayak Chaturthi

Varda Vinayak Chaturthi Vrat Date 2026: वरदा विनायक चतुर्थी व्रत 2026 में कब है?

हिंदू पंचांग में प्रत्येक माह शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि प्रथम पूज्य भगवान गणेश जी को समर्पित रहती है। सामान्य वर्ष में ऐसी बारह विनायक चतुर्थियाँ आती हैं, परंतु अधिकमास पड़ने पर यह संख्या तेरह हो जाती है। इस वर्ष 2026 में अधिकमास आया है और इस अधिकमास की ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी को ही वरदा विनायक चतुर्थी कहा गया है।

वरदा विनायक चतुर्थी 2026: 20 मई, बुधवार | चतुर्थी तिथि: 19 मई दोपहर 2:18 बजे से 20 मई सुबह 11:07 बजे तक | अधिकमास, ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष

भगवान गणेश — वरदा विनायक चतुर्थी व्रत 2026

चतुर्थी तिथि का आरंभ 19 मई 2026 को दोपहर 2 बजकर 18 मिनट पर होगा और इसका समापन 20 मई 2026 को प्रातः 11 बजकर 06-07 मिनट पर होगा। पंचांग में उदया तिथि का विशेष महत्त्व है, अर्थात जिस दिन सूर्योदय के समय जो तिथि चल रही हो, वही उस दिन की तिथि मानी जाती है। 20 मई को सूर्योदय लगभग 5 बजकर 27 मिनट पर होगा और उस समय चतुर्थी तिथि विद्यमान रहेगी, इसलिए वरदा विनायक चतुर्थी व्रत बुधवार, 20 मई 2026 को रखा जाएगा। व्रत का समापन चंद्र दर्शन के बाद होता है। 20 मई को चंद्रोदय प्रातः लगभग 8 बजकर 58 मिनट पर होगा। इस समय चंद्रमा को जल, दूध अथवा गंगाजल से अर्घ्य अर्पित करने के पश्चात ही व्रत का पारण करना उचित है। आइए जानते हैं वरदा विनायक चतुर्थी व्रत का महत्त्व, पूजा विधि और व्रत कथा

ध्यान रखें: भौगोलिक स्थिति के कारण भारत के अलग-अलग स्थानों में सूर्योदय और सूर्यास्त का समय अलग हो सकता है। इसलिए सटीक जानकारी के लिए अपने स्थानीय पंचांग या खगोलीय विवरण जरूर देखें।


वरदा विनायक चतुर्थी का महत्व

हिंदू धर्म में प्रत्येक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी गणपति बप्पा की उपासना का दिन है, परंतु जो चतुर्थी अधिकमास में पड़ती है, उसका स्थान सबसे ऊपर है। मुद्गल पुराण में इस तिथि को “वरदा” नाम से पुकारा गया है, क्योंकि “वरद” का अर्थ है वरदान देने वाला। प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश अपने इस स्वरूप में भक्तों की इच्छाएँ पूर्ण करते हैं और उनके जीवन में धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष, चारों पुरुषार्थों का मार्ग खोलते हैं। पुराणों में ऋषि जैमिनी ने राजा सुषेण को स्पष्ट कहा है कि जो राजा इस चतुर्थी व्रत को भूल जाता है, उस पर संकट आने में देर नहीं लगती। यह व्रत केवल व्यक्तिगत मनोकामना के लिए नहीं, पूरे परिवार और समाज की रक्षा के लिए भी धारण किया जाता है। भाद्रपद की गणेश चतुर्थी जहाँ गणपति का जन्मोत्सव है, वहीं अधिकमास की यह वरदा विनायक चतुर्थी उनकी वरदायिनी शक्ति की उपासना का पर्व है। व्रत रखने वाले को धन, संतान, यश और दीर्घायु का आशीर्वाद मिलता है। मुद्गल पुराण के अनुसार, अधिकमास की शुक्ल पक्ष चतुर्थी का पुण्य वर्ष की अन्य सभी चतुर्थियों से अधिक होता है।


Varda Vinayak Chaturthi Vrat Puja Vidhi: वरदा विनायक चतुर्थी व्रत की पूजा विधि

  • व्रत से एक दिन पहले यानी 19 मई की शाम से ही मन और आहार की शुद्धता का ध्यान रखें। तामसिक भोजन, मांस, मदिरा और नकारात्मक विचारों से दूर रहें।
  • 20 मई को ब्रह्म मुहूर्त में उठें, स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पीले या लाल रंग के वस्त्र इस दिन विशेष रूप से उचित माने गए हैं।
  • घर के पूजा स्थान को साफ करें। एक चौकी पर पीला या लाल कपड़ा बिछाएँ और भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
  • दीपक प्रज्वलित कर संकल्प लें। मन में स्पष्ट भाव रखें कि यह व्रत वरदा विनायक की कृपा प्राप्त करने के लिए और परिवार की मंगल कामना के लिए रखा जा रहा है।
  • पूजा में गणपति को दूर्वा घास अर्पित करें। 21 दूर्वा की पत्तियाँ एक साथ चढ़ाना सर्वोत्तम है। लाल फूल, सिंदूर, अक्षत और मोदक या बूँदी के लड्डू का भोग लगाएँ।
  • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और शक्कर) से अभिषेक करें, फिर स्वच्छ जल से स्नान कराकर चंदन का लेप करें।
  • “ॐ गं गणपतये नमः” का जाप कम से कम 108 बार करें। गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ करना हो तो इस दिन का फल कई गुना बढ़ जाता है।
  • उसके बाद वरदा विनायक चतुर्थी की व्रत कथा का श्रवण या पाठ करें। कथा सुनने के बाद गणेश आरती करें और प्रसाद वितरित करें।
  • व्रत के दिन अन्न ग्रहण न करें। फल, दूध, साबूदाना या एक समय सात्विक फलाहार ले सकते हैं। पूरे दिन मन में गणपति का स्मरण बनाए रखें।
  • क्रोध, झूठ, निंदा और वाद-विवाद से बचें। व्रत के दिन इन्द्रियों पर संयम रखना ही व्रत की असली साधना है।
  • इस दिन चंद्रमा को देखना वर्जित है। 20 मई को चंद्रोदय प्रातः लगभग 8 बजकर 58 मिनट पर होगा। यदि भूलवश चंद्र दर्शन हो जाए तो तुरंत व्रत कथा का पाठ करें और “ॐ गं गणपतये नमः” का 108 बार जाप करें, इससे चंद्र दोष का प्रभाव शांत होता है।
  • सायंकाल पुनः आरती करें और रात्रि में गणपति का ध्यान करते हुए सोएँ।
  • अगले दिन 21 मई को पंचमी तिथि पर पारण करें। पारण से पहले किसी ब्राह्मण को भोजन कराएँ या यथाशक्ति दान करें, फिर स्वयं अन्न ग्रहण करें।

Varda Vinayak Chaturthi Katha: वरदा विनायक चतुर्थी व्रत की कथा

राजा सुषेण और ऋषि जैमिनी का संवाद — वरदा चतुर्थी व्रत कथा मुद्गल पुराण

मुद्गल पुराण में वर्णित इस कथा का आरंभ राजा दशरथ और महर्षि वशिष्ठ के संवाद से होता है। राजा दशरथ ने वशिष्ठ मुनि से प्रार्थना की, “गुरुदेव, मलमास की शुक्ल पक्ष चतुर्थी के इस वरदा व्रत का माहात्म्य मुझे विस्तार से सुनाइए।” तब वशिष्ठ मुनि ने एक प्राचीन कथा सुनाई। उन्होंने कहा कि सुदूर अतीत में आन्ध्र प्रदेश के चम्पकनगर में राजा सुषेण नाम के धर्मपरायण राजा राज करते थे। वे शस्त्र-शास्त्र में पारंगत थे, उनकी दानशीलता की ख्याति सारे भूमंडल में फैली हुई थी और उनके न्यायप्रिय शासन में प्रजा सुखी थी।

जय गणेशाय नमः

एक दिन उनके राज्य में भीषण विपदा आ पड़ी। विषैले सर्पों ने पूरे राज्य को घेर लिया, सर्पदंश से अनेक प्रजाजन मृत्यु को प्राप्त होने लगे। राजा और प्रजा सभी भयभीत हो गए। राजा सुषेण अपने कुल पुरोहित और अन्य मंत्रियों सहित महर्षि जैमिनी के आश्रम पहुँचे और उनके चरणों में प्रणाम कर अपनी व्यथा सुनाई। ऋषि जैमिनी ने राजा को सुनकर गंभीरता से कहा, “हे राजन! तुम्हारे राज्य में यह संकट इसलिए आया क्योंकि तुम्हारे यहाँ अधिकमास की शुक्ल पक्ष चतुर्थी का व्रत बंद हो गया।”

यह शुक्ल पक्ष चतुर्थी ही वरदा है, जो चारों पुरुषार्थ देने वाली है।
जिस राज्य या कुल में यह व्रत विस्मृत हो जाता है, वहाँ अनर्थ आना निश्चित है।

“जो प्रत्येक कार्य के आरम्भ में इस व्रत का पालन नहीं करते, उनके सारे कर्म निष्फल हो जाते हैं।” यह कहकर ऋषि जैमिनी ने इस व्रत की पूरी विधि राजा को बताई।

जय गणेशाय नमः

राजा सुषेण ने अपने राज्य में लौटकर विधि-विधान से वरदा विनायक चतुर्थी का व्रत करवाया। गणपति की विधिपूर्वक पूजा हुई, कथा का श्रवण हुआ और पंचमी को किसी ब्राह्मण के सम्मुख पारण किया गया। भगवान वरदा विनायक प्रसन्न हुए और शीघ्र ही राज्य से सर्पों का आतंक समाप्त हो गया। प्रजा पुनः सुखी हो गई। महर्षि वशिष्ठ ने राजा दशरथ को बताया कि इस व्रत कथा का श्रवण और पाठ मात्र से ही सारे पुण्य सहज प्राप्त हो जाते हैं।

इस प्रकार श्री मुद्गल पुराण में वर्णित अधिकमास शुक्ल पक्ष चतुर्थी माहात्म्य सम्पूर्ण होता है।
जो भक्त श्रद्धापूर्वक इस कथा का श्रवण करते हैं, उन पर भगवान वरदा विनायक की कृपा सदा बनी रहती है।
॥ श्री गणेशाय नमः ॥


वरदा विनायक चतुर्थी व्रत में जपे ये मंत्र

॥ जय गणेशाय नमः ॥

पूजा आरंभ से पहले

श्री वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

पूजा के आरंभ में इसका पाठ करें। इसका अर्थ है कि हे टेढ़ी सूंड वाले, विशाल काय, करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशमान भगवान गणेश, मेरे सभी कार्यों में सदा विघ्नों को दूर करें।

मूल बीज मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः ॥

इस मंत्र का 108 बार जाप रुद्राक्ष या हल्दी की माला पर करें। यह गणेश जी का सबसे सिद्ध बीज मंत्र है।

विघ्ननाशक मंत्र

ॐ गं गौं गणपतये विघ्न विनाशिने स्वाहा ॥

वरद स्वरूप मंत्र

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं गं गणपतये वर वरद सर्वजनमे वशमानय स्वाहा ॥

यह मंत्र विशेष रूप से गणेश जी के वरदायिनी स्वरूप को संबोधित करता है। वरदा विनायक चतुर्थी पर इस मंत्र का जाप मनोकामना पूर्ति के लिए अत्यंत फलदायी है।

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वरदा विनायक चतुर्थी व्रत: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

वरदा विनायक चतुर्थी व्रत 2026 में कब है? वरदा विनायक चतुर्थी व्रत 2026 में बुधवार, 20 मई को रखा जाएगा। चतुर्थी तिथि 19 मई को दोपहर 2 बजकर 18 मिनट पर आरंभ होगी और 20 मई को प्रातः 11 बजकर 06-07 मिनट पर समाप्त होगी। उदया तिथि के नियम के अनुसार 20 मई को सूर्योदय के समय चतुर्थी तिथि विद्यमान रहती है, इसलिए व्रत 20 मई को मान्य है।

वरदा विनायक चतुर्थी और सामान्य विनायक चतुर्थी में क्या अंतर है? सामान्य वर्ष में प्रत्येक माह शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहा जाता है। वरदा विनायक चतुर्थी वह विशेष चतुर्थी है जो अधिकमास (मलमास) में पड़ती है। मुद्गल पुराण के अनुसार इस तिथि का पुण्य वर्ष की अन्य सभी बारह चतुर्थियों से अधिक होता है। अधिकमास लगभग हर तीन वर्ष में एक बार आता है, इसलिए यह चतुर्थी दुर्लभ मानी गई है।

वरदा विनायक चतुर्थी पर चंद्रमा क्यों नहीं देखते? शास्त्रों के अनुसार भगवान गणेश ने चंद्रमा को श्राप दिया था कि जो भी इस तिथि पर उन्हें देखेगा, उस पर मिथ्या कलंक लगेगा। इसलिए इस दिन चंद्र दर्शन वर्जित है। 20 मई 2026 को चंद्रोदय प्रातः लगभग 8 बजकर 58 मिनट पर है। यदि भूलवश चंद्र दर्शन हो जाए तो व्रत कथा का पाठ और “ॐ गं गणपतये नमः” का 108 बार जाप करने से दोष शांत होता है।

वरदा विनायक चतुर्थी व्रत का पारण कब और कैसे करें? व्रत का पारण अगले दिन पंचमी तिथि को किया जाता है। 2026 में पारण 21 मई को होगा। मुद्गल पुराण के अनुसार पारण से पहले किसी ब्राह्मण को भोजन कराएँ या यथाशक्ति दान करें। उसके बाद ही स्वयं अन्न ग्रहण करें। व्रत का पूर्ण फल इसी विधि से मिलता है।

वरदा विनायक चतुर्थी पर कौन से मंत्र जपें? इस दिन मुख्य रूप से तीन मंत्र जपे जाते हैं। “ॐ गं गणपतये नमः” मूल बीज मंत्र है जिसे 108 बार जपें। “ॐ गं गौं गणपतये विघ्न विनाशिने स्वाहा” विघ्ननाशक मंत्र है। “ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं गं गणपतये वर वरद सर्वजनमे वशमानय स्वाहा” वरद स्वरूप का विशेष मंत्र है जो इस व्रत के लिए सबसे उपयुक्त है। विस्तृत जानकारी के लिए मंत्र अनुभाग देखें।

क्या गर्भवती महिलाएँ या बुजुर्ग यह व्रत रख सकते हैं? हाँ, परंतु शारीरिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए। जो लोग पूर्ण उपवास नहीं रख सकते, वे फलाहार या दूध-फल लेकर भी व्रत का संकल्प पूरा कर सकते हैं। शास्त्रों में भाव और श्रद्धा को विधि से अधिक महत्व दिया गया है। किसी भी स्वास्थ्य संबंधी शंका में अपने वैद्य या परिवार के बड़ों से परामर्श लें।

अधिकमास में वरदा चतुर्थी का व्रत क्यों सबसे अधिक फलदायी है? अधिकमास को पुरुषोत्तम मास भी कहते हैं। इस पूरे महीने में किए गए जप, तप और व्रत का फल सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक माना गया है। जब इसी अधिकमास में भगवान गणेश को समर्पित चतुर्थी पड़ती है, तो दोनों का संयोग मिलकर व्रत का पुण्य असाधारण रूप से बढ़ा देता है। मुद्गल पुराण इसे वर्ष की समस्त चतुर्थियों में श्रेष्ठ बताता है।


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