🙏 ॥ जय गणेशाय नमः ॥ 🙏

वक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थी 2026: 29 अक्टूबर तिथि, पूजा विधि, कथा और मंत्र

Vakratunda Sankashti Chaturthi Vrat Date 2026: 29 अक्टूबर 2026 - वक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थी व्रत 2026 में कब है?

कार्तिक कृष्ण चतुर्थी पर वक्रतुण्ड गणेश की पूजा होती है। मुदगल पुराण में गणेश जी के आठ स्वरूपों का वर्णन है और उनमें वक्रतुण्ड का नाम सबसे पहले आता है। “वक्रतुण्ड” अर्थात टेढ़ी सूंड वाले, जो अहंकार और मत्सर को नष्ट करते हैं और भक्त को आत्मविजय का मार्ग दिखाते हैं।

वक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थी 2026: 29 अक्टूबर, गुरुवार | चतुर्थी तिथि: 29 अक्टूबर प्रातः 01:06 से 29 अक्टूबर रात्रि 10:10 तक | चंद्रोदय: 29 अक्टूबर रात्रि 8:55 बजे | कार्तिक कृष्ण पक्ष

इस बार व्रत गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026 को है। कार्तिक कृष्ण चतुर्थी 29 अक्टूबर को प्रातः 01:06 बजे लगती है और उसी दिन रात्रि 10:10 बजे समाप्त हो जाती है। 29 अक्टूबर को सूर्योदय के समय यह तिथि विद्यमान रहेगी, इसलिए उदया तिथि के अनुसार व्रत इसी दिन रखा जाएगा। चंद्रोदय 29 अक्टूबर को रात्रि 8:55 बजे होगा। चंद्रमा के दर्शन होने पर जल, दूध या गंगाजल से चंद्रदेव को अर्घ्य अर्पित करें, तत्पश्चात सात्विक भोजन से व्रत का पारण करें। आइए जानते हैं वक्रतुण्ड संकष्टी का महत्त्व, पूजा विधि और व्रत कथा

वक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थी 2026 व्रत: गणेश पूजा, दूर्वा अर्पण और मोदक का भोग

ध्यान रखें: भौगोलिक स्थिति के कारण भारत के अलग-अलग स्थानों में सूर्योदय और सूर्यास्त का समय अलग हो सकता है। इसलिए सटीक जानकारी के लिए अपने स्थानीय पंचांग या खगोलीय विवरण जरूर देखें।


वक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थी का महत्व

मुद्गल पुराण में गणेश जी के आठ अवतारों का विस्तार से वर्णन है। इन सभी में वक्रतुण्ड का नाम सबसे पहले आता है। “वक्रतुण्ड” अर्थात टेढ़ी सूंड वाले। यह टेढ़ापन सीधेपन की सीमा को लाँघने की क्षमता है, वह बुद्धि जो जहाँ से रास्ता दिखे वहाँ से निकल जाए। वक्रतुण्ड ने मत्सरासुर को परास्त किया था, जो ईर्ष्या और द्वेष का प्रतीक था।

कार्तिक मास की कृष्ण चतुर्थी पर वक्रतुण्ड गणेश की पूजा का विशेष माहात्म्य है क्योंकि यह वह मास है जब कार्य-सिद्धि के विचार मन में प्रबल रहते हैं और ईर्ष्या से उत्पन्न मानसिक बाधाएं भी। मत्सर अर्थात दूसरे की उन्नति सहन न कर पाना, यही वह बाधा है जो व्यक्ति के अपने विकास को भी रोक देती है। वक्रतुण्ड की उपासना उस ग्रंथि को काटती है। मुद्गल पुराण में दत्तात्रेय महाराज ने जब देवों को वक्रतुण्ड का ‘गं’ बीज मंत्र दिया, तभी उनकी सहायता हुई। इस व्रत को जो भक्त पूरी श्रद्धा से करता है, उसके जीवन में आपसी विद्वेष से बनी रुकावटें हटती हैं और कार्य-सिद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।


Vakratunda Sankashti Chaturthi Vrat Puja Vidhi: वक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थी व्रत की पूजा विधि

  • 29 अक्टूबर को ब्रह्ममुहूर्त में उठें, स्नान कर लाल या पीले वस्त्र पहनें।
  • व्रत का संकल्प लें। मन में या स्पष्ट वाणी से कहें कि आज सूर्योदय से चंद्रोदय तक वक्रतुण्ड गणेश की आराधना के लिए यह व्रत रखता/रखती हूं।
  • पूजा स्थल साफ कर उत्तर-पूर्व कोण में चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाएं और भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें।
  • पूजा सामग्री तैयार रखें: शुद्ध जल, गंगाजल, रोली, चंदन, सिंदूर, अक्षत, 21 दूर्वा की गांठें, लाल व पीले फूल, घी का दीपक, धूप, कपूर, नारियल, सुपारी, पान, मोदक, तिल के लड्डू और मौसमी फल।
  • दीपक और धूप जलाएं। गणपति को जल से आचमन कराएं, फिर अक्षत, रोली, चंदन, सिंदूर, दूर्वा और लाल फूल क्रम से अर्पित करें। गणेश जी को तुलसी न चढ़ाएं।
  • भोग में मोदक और तिल के लड्डू अवश्य रखें। गुड़, नारियल और फल भी अर्पित कर सकते हैं।
  • ॐ वक्रतुण्डाय नमः और ॐ गं गणपतये नमः का 108 बार जप करें।
  • संध्याकाल में पुनः पूजन करें। वक्रतुण्ड संकष्टी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें, फिर गणेश आरती करें।
  • रात्रि 8:55 बजे चंद्रोदय पर खुले आकाश में जाएं। तांबे के पात्र में जल, दूध या गंगाजल लेकर चंद्रमा की ओर मुख करके अर्घ्य अर्पित करें।
  • अर्घ्य के बाद गणपति से प्रार्थना कर व्रत का पारण करें। फल, खीर या साबूदाना खिचड़ी उचित है।
  • क्या न करें: प्याज, लहसुन, मांसाहार और नशा वर्जित है। तुलसी न चढ़ाएं। चंद्रोदय से पहले व्रत न तोड़ें।

Vakratunda Sankashti Chaturthi Vrat Katha: वक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थी व्रत की कथा

भगवान वक्रतुण्ड गणेश सिंहवाहन, वक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा

मुद्गल पुराण के प्रथम स्कन्ध में मत्सरासुर की उत्पत्ति का विचित्र आख्यान है। देवराज इन्द्र के राज्याभिषेक के दिन स्वर्ग में महोत्सव था। सभी देव, यक्ष, गन्धर्व, नाग और मुनि आए थे। अप्सरा रम्भा का नृत्य चल रहा था। उस समय इन्द्र काम के वशीभूत हो गए और अनुचित समय पर महोत्सव छोड़कर एकांत वन में चले गए। वहाँ दुर्वासा ऋषि आ गए। इन्द्र ने लज्जावश भागने की कोशिश की। उस उद्वेग में इन्द्र का वीर्यपात हो गया और वह पृथ्वी माता की गोद में गिरा।

॥ ॐ वक्रतुण्डाय नमः ॥

पृथ्वी माता ने उस बीज को पुत्र की तरह पाला। जो जीव उत्पन्न हुआ वह हिमालय के बराबर विशाल था, क्रूर था, और किसी की भी उन्नति देखकर जल उठता था। भूमिदेवी ने उसका नाम रखा ‘मत्सर’, जिसका अर्थ है ईर्ष्या। पाँच वर्ष की आयु में उसका उपनयन संस्कार हुआ, वेद पढ़े और शुक्राचार्य से पंचाक्षरी मंत्र की दीक्षा लेकर शिवजी की कठोर तपस्या की। हजार दिव्य वर्षों बाद शिवजी ने प्रसन्न होकर उसे अजेयता का वरदान दिया। फिर मत्सरासुर ने एक के बाद एक स्वर्ग, वैकुण्ठ, सत्यलोक और अंततः कैलाश पर चढ़ाई कर दी। तीनों लोकों से देव बेघर हो गए।

देवों की व्यथा सुनकर भगवान दत्तात्रेय आगे आए और देवताओं को ‘गं’ बीज मंत्र देकर वक्रतुण्ड गणेश की उपासना करवाई। गणेश जी सिंह पर आरूढ़ होकर वक्रतुण्ड रूप में प्रकट हुए। उन्होंने मत्सरासुर की राजधानी तक कूच किया। मत्सरासुर के दोनों पुत्र सुन्दरप्रिय और विषयप्रिय युद्ध में परास्त हुए। मत्सरासुर वक्रतुण्ड के सामने आया, किंतु उनके दर्शन मात्र से उसकी ईर्ष्या की जड़ें हिल गईं। उसे साक्षात परब्रह्म का बोध हुआ। वह गणेश जी के चरणों में गिर पड़ा। वक्रतुण्ड ने उसे सुधार दिया। मत्सर अब सज्जनों के लिए मित्र और दुष्टों के लिए दंड बन गया। गणेश जी स्वानन्दपुर लौट गए।

ईर्ष्या का रोग जब चरम पर हो, तभी वक्रतुण्ड की शरण सबसे फलदायी होती है।
जो मत्सर को जीतता है, वह स्वयं की सबसे बड़ी बाधा को पार कर जाता है।

जो भक्त कार्तिक की इस वक्रतुण्ड संकष्टी पर यह कथा श्रद्धा से सुनता है,
उसके जीवन में ईर्ष्या और द्वेष से बनी बाधाएं हटती हैं, बुद्धि निर्मल होती है।
॥ वक्रतुण्ड गणपतये नमः ॥


वक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थी व्रत में जपे ये मंत्र

॥ जय गणेशाय नमः ॥

वक्रतुण्ड नाम मंत्र

ॐ वक्रतुण्डाय नमः ॥

वक्रतुण्ड स्तुति (मुद्गल पुराण, खण्ड १)

नमस्ते वक्रतुण्डाय सर्वसिद्धिप्रदाय च।
सर्वबन्धविमोक्षाय नमस्ते वक्रतुण्डाय च ॥

मूल बीज मंत्र (गणपत्यथर्वशीर्ष)

ॐ गं गणपतये नमः ॥

गणेश गायत्री मंत्र

ॐ एकदन्ताय विद्महे।
वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥

विघ्ननाशक मंत्र

ॐ गं गौं गणपतये विघ्न विनाशिने स्वाहा ॥

पूजा आरंभ श्लोक

श्री वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

चंद्रोदय अर्घ्य मंत्र

गगनार्णवमाणिक्य चन्द्र दाक्षायणीपते।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं गणेशप्रतिरूपक ॥

यहाँ पढ़ें - Ganesh Aarti


वक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थी व्रत: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

वक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थी 2026 में कब है? वक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थी व्रत गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026 को है। कृष्ण पक्ष चतुर्थी तिथि 29 अक्टूबर को प्रातः 01:06 बजे से 29 अक्टूबर को रात्रि 10:10 बजे तक रहेगी। उदयातिथि के अनुसार व्रत 29 अक्टूबर को ही मान्य है।

वक्रतुण्ड गणेश को क्यों कहा जाता है? वक्रतुण्ड का अर्थ है टेढ़ी सूंड। वक्रतुण्ड गणेश का स्वरूप अहंकार और नकारात्मक शक्तियों को परास्त करने का प्रतीक है। यह रूप विजय, बुद्धि और आत्मविजय का प्रतीक है।

चंद्रोदय का समय क्या है? 29 अक्टूबर 2026 को चंद्रोदय रात्रि 8:55 बजे होगा। चंद्रदर्शन के बाद ही व्रत का पारण करना चाहिए।

इस व्रत में कौन सी कथा सुनी जाती है? वक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थी में गणेश पुराण से वक्रतुण्ड गणेश की कथा सुनी जाती है, जिसमें अहंकार के विनाश और आत्मविजय का वर्णन है।

वक्रतुण्ड गणेश को कौन से भोग लगाएं? मोदक, तिल के लड्डू, नारियल, गुड़, दूर्वा और लाल फूल वक्रतुण्ड गणेश को अर्पित करें। ये सभी सामग्री इस व्रत में अर्पित की जाती हैं।

व्रत का पारण कब करें? पारण 29 अक्टूबर 2026 की रात्रि 8:55 बजे चंद्रोदय के बाद करें। पहले चंद्रमा को जल, दूध या गंगाजल से अर्घ्य दें, फिर सात्विक भोजन से व्रत खोलें।

चंद्रदर्शन के नियम क्या हैं? चतुर्थी तिथि में चंद्रदर्शन करना चाहिए। चंद्रोदय के बाद खुले आकाश में चंद्रमा को देखते हुए अर्घ्य दें। चंद्रदर्शन से पहले व्रत न तोड़ें।

वक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थी पर कौन सा मंत्र जपें? ॐ वक्रतुण्डाय नमः यह वक्रतुण्ड गणेश का विशेष मंत्र है। इसके अलावा ॐ गं गणपतये नमः और गणेश गायत्री मंत्र का जप भी करें।

क्या महिलाएं भी यह व्रत रख सकती हैं? हां, वक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थी व्रत महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए समान रूप से फलदायी है। परिवार के सभी सदस्य मिलकर यह व्रत कर सकते हैं।


twitter facebook instagram whatsapp