कपर्दीश विनायक चतुर्थी 2026: 14 अक्टूबर, तिथि, मुहूर्त, पूजा विधि
Kapardisha Vinayak Chaturthi Date 2026: कपर्दीश विनायक चतुर्थी कब है?
साल भर में 12 विनायक चतुर्थियां आती हैं, और आश्विन मास की शुक्ल पक्ष चतुर्थी कपर्दीश विनायक चतुर्थी कहलाती है। यह चतुर्थी भगवान गणेश के कपर्दीश स्वरूप को समर्पित है, जिनके मस्तक पर शिव की भाँति जटाएं हैं। स्कंद पुराण के प्रभास खंड (अध्याय 38) में इस स्वरूप का विस्तृत वर्णन मिलता है। बुधवार के दिन पड़ने वाली चतुर्थी और भी विशेष मानी जाती है क्योंकि बुध गणेश जी के प्रिय हैं। वर्ष 2026 में कपर्दीश विनायक चतुर्थी 14 अक्टूबर, बुधवार को पड़ रही है।
कपर्दीश विनायक चतुर्थी 2026: 14 अक्टूबर, बुधवार | चतुर्थी तिथि: 13 अक्टूबर रात 11:27 से 15 अक्टूबर रात 1:13 तक | आश्विन महीने, शुक्ल पक्ष

कपर्दीश विनायक चतुर्थी 2026 का व्रत 14 अक्टूबर, बुधवार को रखा जाएगा। चतुर्थी तिथि 13 अक्टूबर की रात 11:27 बजे प्रारंभ होगी और 15 अक्टूबर की रात 1:13 बजे समाप्त होगी। पूजा का सर्वोत्तम मध्याह्न मुहूर्त 14 अक्टूबर को प्रातः 11:00 बजे से दोपहर 1:16 बजे तक रहेगा। इस लेख में कपर्दीश विनायक चतुर्थी का महत्व, पूजा विधि और व्रत कथा विस्तार से पढ़ें।
ध्यान रखें: उपरोक्त सभी समय भारतीय मानक समय (IST) के अनुसार हैं। अपने नगर के स्थानीय पंचांग के अनुसार समय में अंतर हो सकता है।
कपर्दीश विनायक चतुर्थी का महत्व जाने
गणेश पुराण और मुद्गल पुराण में गणेश जी के 32 रूपों का वर्णन मिलता है, जिनमें कपर्दीश एक विशिष्ट स्वरूप है। “कपर्द” का अर्थ है जटा, अर्थात जिनके मस्तक पर जटाएं हों। यह स्वरूप शिव और शक्ति के मिलन का प्रतीक है। आश्विन शुक्ल चतुर्थी को गणेश जी की पूजा करने से व्यक्ति के जीवन में आने वाली समस्त विघ्न-बाधाएं दूर होती हैं। इस दिन व्रत रखने से बुद्धि, विद्या, धन और सिद्धि की प्राप्ति होती है। नए कार्यों का शुभारंभ करने से पहले गणेश जी की आराधना करने की परंपरा इसीलिए है क्योंकि वे विघ्नहर्ता हैं।
बुधवार के दिन गणेश जी की पूजा का विशेष महत्व है। बुध ग्रह गणेश जी का प्रिय ग्रह है, इसलिए बुधवार को पड़ने वाली विनायक चतुर्थी पर पूजा करने से बुध ग्रह का दोष भी दूर होता है। विद्यार्थियों के लिए यह व्रत विशेष फलदायी है। इस दिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ, मोदक का भोग और दूर्वा अर्पण करने से गणेश जी शीघ्र प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।
Kapardisha Vinayak Chaturthi Vrat Puja Vidhi: कपर्दीश विनायक चतुर्थी की पूजा विधि
- ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ पीले या लाल वस्त्र धारण करें, क्योंकि गणपति पूजन में ये रंग शुभ माने जाते हैं।
- घर के पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें और उत्तर-पूर्व दिशा में चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर गणेश की मूर्ति स्थापित करें।
- मध्याह्न मुहूर्त (11:00 AM से 1:16 PM) में पूजा आरंभ करें, क्योंकि कपर्दीश विनायक की पूजा के लिए यही समय सर्वश्रेष्ठ है।
- सबसे पहले गणपति का आवाहन करें और जल, अक्षत तथा फूल चढ़ाकर उन्हें आसन पर प्रतिष्ठित करें।
- पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गुड़) से गणपति को स्नान कराएं और लाल या पीले वस्त्र से उनका श्रृंगार करें।
- 21 दूर्वा की गांठें, मोदक, तिल के लड्डू, नारियल और मौसमी फल गणेश जी को अर्पित करें, क्योंकि स्कंद पुराण में ये विशेष रूप से अनुशंसित हैं।
- धूप और दीप प्रज्वलित करके ॐ कपर्दीशाय नमः मंत्र का जाप करें और मन को शांत रखते हुए श्रद्धा भाव से पूजन करें।
- पूजा के अंत में गणेश आरती करें और परिवार के सभी सदस्य मिलकर आरती में भाग लें।
- इस दिन कपर्दीश विनायक चतुर्थी की व्रत कथा सुनना या पढ़ना अवश्य करें, क्योंकि कथा श्रवण के बिना व्रत अधूरा माना जाता है।
- दिनभर सात्विक भोजन करें और संभव हो तो निर्जल व्रत रखें, साथ ही क्रोध और नकारात्मक विचारों से दूर रहने का प्रयास करें।
- इस दिन तुलसी पत्र गणेश जी को न चढ़ाएं, क्योंकि शास्त्रों में इसका निषेध बताया गया है।
- चतुर्थी तिथि समाप्त होने के बाद (15 अक्टूबर, रात 1:13 के बाद) सूर्योदय के पश्चात सात्विक भोजन से व्रत का पारण करें।
Kapardisha Vinayak Chaturthi Vrat Katha: कपर्दीश विनायक चतुर्थी की व्रत कथा

स्कंद पुराण के प्रभास खंड में कपर्दीश विनायक की कथा वर्णित है। एक समय की बात है, देवी पार्वती ने भगवान शिव से पूछा कि कपर्दीश गणेश कौन हैं और उनकी पूजा का क्या महत्व है। शिव जी ने बताया कि कृत युग में गणेश का नाम हेरंब था, त्रेता में विघ्नमर्दन, द्वापर में लंबोदर और कलियुग में उन्हें कपर्दीश के नाम से जाना जाता है। “कपर्दी” शिव का ही एक नाम है, जिनकी जटाएं पवित्र हैं। चूंकि गणेश शिव-पुत्र हैं, इसलिए आश्विन मास में उनके इस कपर्दीश स्वरूप की पूजा होती है।
शिव जी ने आगे कहा, “हे देवी, जो भी मनुष्य प्रभास क्षेत्र में कपर्दीश विनायक के दर्शन करता है, उसके सभी विघ्न नष्ट हो जाते हैं। यह गणेश स्वरूप विघ्नराज है, जो विघ्नों का स्वामी है। जब कोई भक्त सोमनाथ की यात्रा पर जाता है और कपर्दीश गणेश की पूजा किए बिना आगे बढ़ता है, तो उसके मार्ग में बाधाएं आती हैं। किंतु जो श्रद्धापूर्वक कपर्दीश की वंदना करता है, उसका मार्ग निर्विघ्न हो जाता है।” पार्वती ने पूछा कि इस स्वरूप की पूजा कैसे करें। शिव जी ने कहा, “आश्विन शुक्ल चतुर्थी को मध्याह्न काल में कपर्दीश गणपति की पूजा करनी चाहिए। दूर्वा, मोदक, लाल पुष्प और नारियल अर्पित करें। मन में केवल यह भाव रखें कि गणपति विघ्नहर्ता हैं।”
कपर्दीश वह स्वरूप है जो शिव और शक्ति दोनों का तेज धारण करता है।
जो इस स्वरूप की आराधना करता है, उसके जीवन में बुद्धि, विद्या और सिद्धि आती है।
तभी से यह परंपरा चली आ रही है कि आश्विन शुक्ल चतुर्थी को कपर्दीश विनायक की पूजा की जाती है। जो भक्त इस दिन व्रत रखता है और विधिपूर्वक गणपति का पूजन करता है, उसके घर में सुख, समृद्धि और शांति का वास होता है। गणेश जी की कृपा से उसके सभी कार्य सिद्ध होते हैं और जीवन में कोई विघ्न नहीं आता।
जो साधक आश्विन शुक्ल चतुर्थी को कपर्दीश विनायक का पूजन करता है,
उसके जीवन के सभी विघ्न दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
॥ ॐ गं गणपतये नमः ॥
कपर्दीश विनायक चतुर्थी व्रत में जपे ये मंत्र
॥ जय गणेशाय नमः ॥
कपर्दीश नाम मंत्र
ॐ कपर्दीशाय नमः ॥
संकटनाशन गणेश स्तोत्र (नारद पुराण)
प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम्।
भक्तावासं स्मरेन्नित्यं आयुःकामार्थसिद्धये ॥
प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम्।
तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम् ॥
द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो ॥
मूल बीज मंत्र (गणपत्यथर्वशीर्ष)
ॐ गं गणपतये नमः ॥
गणेश गायत्री मंत्र
ॐ एकदन्ताय विद्महे।
वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ॥
विघ्ननाशक मंत्र
ॐ गं गौं गणपतये विघ्न विनाशिने स्वाहा ॥
पूजा आरंभ श्लोक
श्री वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
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कपर्दीश विनायक चतुर्थी व्रत: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
कपर्दीश विनायक चतुर्थी 2026 में कब है?
कपर्दीश विनायक चतुर्थी 2026 में 14 अक्टूबर, बुधवार को है। चतुर्थी तिथि 13 अक्टूबर की रात 11:27 बजे से प्रारंभ होकर 15 अक्टूबर को रात 1:13 बजे तक रहेगी। उदया-तिथि के अनुसार व्रत 14 अक्टूबर को रखा जाएगा।
कपर्दीश विनायक चतुर्थी का क्या महत्व है?
आश्विन मास की शुक्ल पक्ष चतुर्थी को कपर्दीश विनायक चतुर्थी कहते हैं। इस दिन भगवान गणेश की पूजा करने से जीवन की कठिनाइयों और विघ्नों का नाश होता है और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। बुधवार को पड़ने वाली यह चतुर्थी विशेष फलदायी है।
पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है?
कपर्दीश विनायक चतुर्थी पर पूजा का सर्वोत्तम समय मध्याह्न मुहूर्त है, जो 14 अक्टूबर को प्रातः 11:00 बजे से दोपहर 1:16 बजे तक रहेगा। इसी काल में गणेश जी की विशेष पूजा करना अत्यंत फलदायी है।
कपर्दीश गणेश का क्या अर्थ है?
कपर्दीश गणेश का अर्थ है जटाधारी गणेश। यह गणेश जी का वह स्वरूप है जिनके मस्तक पर शिव की जटाओं जैसे घुंघराले बाल (कपर्द) हैं। यह रूप शिव और पार्वती के मिलन का प्रतीक है और शिव-शक्ति के संयोग को दर्शाता है।
कपर्दीश विनायक चतुर्थी व्रत में कौन सी कथा सुनी जाती है?
इस व्रत में स्कंद पुराण के प्रभास खंड से कपर्दीश विनायक की कथा सुनी जाती है। कथा में शिव और पार्वती का संवाद है जिसमें कपर्दीश स्वरूप का महत्व बताया गया है।
विनायक चतुर्थी और संकष्टी चतुर्थी में क्या अंतर है?
विनायक चतुर्थी शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को होती है और इसमें मध्याह्न में पूजन का विधान है। संकष्टी चतुर्थी कृष्ण पक्ष की चतुर्थी है और उसमें चंद्रोदय के बाद व्रत तोड़ते हैं।
कपर्दीश विनायक चतुर्थी व्रत में कौन सा मंत्र सबसे महत्वपूर्ण है?
इस व्रत में ॐ कपर्दीशाय नमः कपर्दीश गणेश का विशेष मंत्र माना जाता है। साथ ही ॐ गं गणपतये नमः बीज मंत्र का 108 बार जाप भी विशेष फलदायी है।
इस दिन गणेश जी को क्या भोग चढ़ाएं?
मोदक, तिल के लड्डू, नारियल, गुड़ और मौसमी फल का भोग लगाएं। 21 दूर्वा की गांठें और लाल पुष्प विशेष रूप से प्रिय हैं। तुलसी कभी न चढ़ाएं।
॥ गणपति बप्पा मोरया, मंगलमूर्ति मोरया ॥


