🙏 ॥ जय गणेशाय नमः ॥ 🙏

हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी 2026: 31 अगस्त तिथि, पूजा विधि, कथा और मंत्र

Heramba Sankashti Chaturthi Vrat Date 2026: 31 अगस्त 2026 - हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी व्रत 2026 में कब है?

गणेश जी के हेरम्ब स्वरूप की पूजा भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी को होती है। हेरम्ब पंचमुखी और सिंहवाहन गणपति हैं, “हेरम्ब” का अर्थ है रक्षक। जो भक्त इस दिन हेरम्ब गणेश की उपासना करते हैं, उन्हें परिवार की सुरक्षा, साहस और आत्मबल की प्राप्ति होती है।

हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी 2026: 31 अगस्त, सोमवार | चतुर्थी तिथि: 31 अगस्त प्रातः 08:50 से 1 सितंबर प्रातः 07:42 तक | चंद्रोदय: 31 अगस्त रात्रि 8:57 बजे | भाद्रपद कृष्ण पक्ष

व्रत सोमवार, 31 अगस्त 2026 को है। भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी तिथि 31 अगस्त को प्रातः 08:50 बजे से शुरू होकर 1 सितंबर प्रातः 07:42 बजे तक रहेगी। 31 अगस्त को सूर्योदय होने पर चतुर्थी तिथि विद्यमान रहेगी, इसलिए उदया तिथि के अनुसार व्रत इसी दिन मान्य है। रात्रि 8:57 बजे चंद्रमा दिखेगा, तब खुले आसमान में आकर चंद्रदेव को जल, दूध या गंगाजल से अर्घ्य दें और व्रत का पारण करें। आइए जानते हैं हेरम्ब संकष्टी का महत्त्व, पूजा विधि और इस व्रत की कथा

हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी 2026 व्रत: हेरम्ब गणेश पूजा, दूर्वा अर्पण और मोदक का भोग

ध्यान रखें: भौगोलिक स्थिति के कारण भारत के अलग-अलग स्थानों में सूर्योदय और सूर्यास्त का समय अलग हो सकता है। इसलिए सटीक जानकारी के लिए अपने स्थानीय पंचांग या खगोलीय विवरण जरूर देखें।


हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी का महत्व

पंचमुखी, सिंहवाहन, दसभुजाधारी। हेरम्ब गणेश का यह रूप देखते ही भक्त के मन में एक विचित्र शांति उतरती है। संस्कृत में “हेरम्ब” का अर्थ है: जो दुर्बल और असहाय की रक्षा करे। ब्रह्म वैवर्त पुराण में लिखा है कि “हे” अक्षर दीनता का और “रम्ब” रक्षा का प्रतीक है, इसलिए हेरम्ब वे गणेश हैं जो सबसे कमज़ोर की भी पुकार सुनते हैं।

भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी पर हेरम्ब गणेश की उपासना इसीलिए फलदायी है क्योंकि यह रूप बाहरी विपत्तियों के साथ भीतर के भय, संशय और दुर्बल विचारों को भी जड़ से हटाता है। पाँच मुख पाँच दिशाओं की रक्षा के प्रतीक हैं, और सिंह का वाहन यह बताता है कि हेरम्ब किसी क्षत्रिय राजा की भाँति अपने भक्तों की रखवाली करते हैं। स्कन्द पुराण में वाराणसी के छप्पन विनायकों में हेरम्ब विनायक का स्थान उत्तर-पश्चिम की रक्षा में निर्धारित है। जो परिवार विरोध, भय, शत्रु-भय अथवा मानसिक उलझन से घिरा हो, उसके लिए इस संकष्टी पर हेरम्ब गणेश की पूजा एक सच्चा आश्रय है। दिन भर उपवास, संध्याकाल पूजन और रात्रि में चंद्र अर्घ्य, तीनों मिलकर भक्त को उस आत्मबल से भर देते हैं जो हेरम्ब स्वयं धारण करते हैं।


Heramba Sankashti Chaturthi Vrat Puja Vidhi: हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी व्रत की पूजा विधि

  • 31 अगस्त को ब्रह्ममुहूर्त में उठें, स्नान कर लाल या पीले वस्त्र पहनें।
  • व्रत का संकल्प लें। मन में या स्पष्ट वाणी से कहें कि आज सूर्योदय से चंद्रोदय तक हेरम्ब गणेश की आराधना के लिए यह व्रत रखता/रखती हूं।
  • पूजा स्थल साफ कर उत्तर-पूर्व कोण (ईशान कोण) में चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाएं और भगवान हेरम्ब गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
  • पूजा सामग्री तैयार रखें: शुद्ध जल, गंगाजल, रोली, चंदन, सिंदूर, अक्षत, 21 दूर्वा की गांठें, लाल व पीले फूल, घी का दीपक, धूप, कपूर, नारियल, सुपारी, पान, मोदक, तिल के लड्डू और मौसमी फल।
  • दीपक और धूप जलाएं। गणपति को जल से आचमन कराएं, फिर अक्षत, रोली, चंदन, सिंदूर, दूर्वा और लाल फूल क्रम से अर्पित करें। गणेश जी को तुलसी न चढ़ाएं।
  • भोग में मोदक और तिल के लड्डू अवश्य रखें। गुड़, नारियल और फल भी अर्पित कर सकते हैं।
  • ॐ हेरम्बाय नमः और ॐ गं गणपतये नमः का 108 बार जप करें।
  • संध्याकाल में पुनः पूजन करें। हेरम्ब संकष्टी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें, फिर गणेश आरती करें।
  • रात्रि 8:57 बजे चंद्रोदय पर खुले आकाश में जाएं। तांबे के पात्र में जल, दूध या गंगाजल लेकर चंद्रमा की ओर मुख कर अर्घ्य अर्पित करें।
  • अर्घ्य के बाद गणपति से प्रार्थना कर व्रत का पारण करें। फल, खीर या साबूदाना खिचड़ी से पारण उचित है।
  • क्या न करें: प्याज, लहसुन, मांसाहार और नशा वर्जित है। तुलसी न चढ़ाएं। चंद्रोदय से पहले व्रत न तोड़ें।

Heramba Sankashti Chaturthi Vrat Katha: हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी व्रत की कथा

भगवान हेरम्ब गणेश, पंचमुखी सिंहवाहन, हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा

हेरम्ब उपनिषद में महर्षि पराशर और हेरम्ब गणेश के बीच एक गहन संवाद मिलता है। पराशर ऋषि एक बार गहन चिंता में थे। उनके आश्रम पर संकट के बादल मंडरा रहे थे, शिष्य बिखर रहे थे, जंगली जीव नाश कर रहे थे, और भीतर से भी मन अशांत था। एक दिन आश्रम के एकांत में उन्होंने एक विलक्षण दृश्य देखा। सिंह पर विराजमान, पाँच मुखों से तेज बरसाते, दस भुजाओं में आयुध धारण किए एक दिव्य रूप प्रकट हुआ। पराशर ने साष्टांग प्रणाम किया और पूछा: “हे गणपति, आपके ये पाँच मुख क्या संकेत देते हैं? आपका यह रूप किसलिए है?”

॥ ॐ हेरम्बाय नमः ॥

हेरम्ब ने प्रसन्न होकर उत्तर दिया: “पराशर, मेरा पहला मुख पूर्व में है, जो नई शुरुआत की रक्षा करता है। दूसरा दक्षिण में है, पितरों और धर्म की रक्षा के लिए। तीसरा पश्चिम में है, संचित ज्ञान और अनुभव की रक्षा के लिए। चौथा उत्तर में है, देवों और कल्याण की दिशा की रक्षा के लिए। और पाँचवाँ मुख ऊपर उठा हुआ है, जो ईश्वर की ओर जाने वाले प्रत्येक जीव की रक्षा करता है। मेरा वाहन माता पार्वती का सिंह है, जो यह दर्शाता है कि मेरी शक्ति साधारण नहीं, माँ की शक्ति का अंश है।” फिर हेरम्ब ने कहा: “मेरे पास आने का सबसे सरल मार्ग यही है कि तुम अपनी दुर्बलता छिपाओ मत। जो दुर्बल होकर भी मुझसे छिपाता है, उसे मेरी कृपा नहीं मिलती। जो कहता है, ‘हे हेरम्ब, मैं असहाय हूँ’, उसके लिए मैं सिंह की भाँति खड़ा हो जाता हूँ।” पराशर की आँखें भर आईं। उन्होंने उसी क्षण हेरम्ब की पंचमुखी आराधना का प्रण लिया और आश्रम में शांति लौट आई। तब से यह परंपरा चली कि भाद्रपद की संकष्टी पर हेरम्ब की उपासना करने वाले भक्त को पाँचों दिशाओं से रक्षा मिलती है।

दुर्बलता छिपाने वाला हेरम्ब की शरण से वंचित रहता है।
जो खुलकर कहे “मैं असहाय हूँ”, उसके लिए हेरम्ब सिंह की भाँति प्रकट होते हैं।

जो भक्त भाद्रपद की हेरम्ब संकष्टी पर यह कथा श्रद्धा से सुनता है,
उसके परिवार पर आने वाले भय और संकट दूर होते हैं, आत्मबल बढ़ता है।
॥ हेरम्ब गणपतये नमः ॥


हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी व्रत में जपे ये मंत्र

॥ जय गणेशाय नमः ॥

हेरम्ब नाम मंत्र

ॐ हेरम्बाय नमः ॥

हेरम्ब ध्यान मंत्र (मुद्गल पुराण)

अभयवरदहस्तं पाशदन्ताक्षमालाश्रुणिपरशुदधानो मुद्गरं मोदकं च।
फलमधिगतसिंहः पञ्चमातङ्गवक्त्रो गणपतिरतिगौरः पातु हेरम्बनामा ॥

मूल बीज मंत्र (गणपत्यथर्वशीर्ष)

ॐ गं गणपतये नमः ॥

गणेश गायत्री मंत्र

ॐ एकदन्ताय विद्महे।
वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥

विघ्ननाशक मंत्र

ॐ गं गौं गणपतये विघ्न विनाशिने स्वाहा ॥

पूजा आरंभ श्लोक

श्री वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

चंद्रोदय अर्घ्य मंत्र

गगनार्णवमाणिक्य चन्द्र दाक्षायणीपते।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं गणेशप्रतिरूपक ॥

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हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी व्रत: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी 2026 में कब है? हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी व्रत सोमवार, 31 अगस्त 2026 को है। कृष्ण पक्ष चतुर्थी तिथि 31 अगस्त को प्रातः 08:50 बजे से 1 सितंबर को प्रातः 07:42 बजे तक रहेगी। उदयातिथि के अनुसार व्रत 31 अगस्त को ही मान्य है।

हेरम्ब गणेश को क्यों कहा जाता है? हेरम्ब का अर्थ है सुरक्षा और रक्षा। हेरम्ब गणेश का स्वरूप परिवार की सुरक्षा, साहस और शक्ति का प्रतीक है। यह रूप भय को दूर करने और आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए पूजा जाता है।

चंद्रोदय का समय क्या है? 31 अगस्त 2026 को चंद्रोदय रात्रि 8:57 बजे होगा। चंद्रदर्शन के बाद ही व्रत का पारण करना चाहिए।

इस व्रत में कौन सी कथा सुनी जाती है? हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी में गणेश पुराण से हेरम्ब गणेश की कथा सुनी जाती है, जिसमें उनके साहस और परिवार की रक्षा का वर्णन है।

हेरम्ब गणेश को कौन से भोग लगाएं? मोदक, तिल के लड्डू, नारियल, गुड़, दूर्वा और लाल फूल हेरम्ब गणेश को अर्पित करें। ये सभी सामग्री इस व्रत में विशेष रूप से अर्पित की जाती हैं।

व्रत का पारण कब करें? पारण 31 अगस्त 2026 की रात्रि 8:57 बजे चंद्रोदय के बाद करें। पहले चंद्रमा को जल, दूध या गंगाजल से अर्घ्य दें, फिर सात्विक भोजन से व्रत खोलें।

चंद्रदर्शन के नियम क्या हैं? चतुर्थी तिथि में चंद्रदर्शन करना चाहिए। चंद्रोदय के बाद खुले आकाश में चंद्रमा को देखते हुए अर्घ्य दें। चंद्रदर्शन से पहले व्रत न तोड़ें।

हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी पर कौन सा मंत्र जपें? ॐ हेरम्बाय नमः यह हेरम्ब गणेश का विशेष मंत्र है। इसके अलावा ॐ गं गणपतये नमः और गणेश गायत्री मंत्र का जप भी करें।

क्या महिलाएं भी यह व्रत रख सकती हैं? हां, हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी व्रत महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए समान रूप से फलदायी है। परिवार के सभी सदस्य मिलकर यह व्रत कर सकते हैं।


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