🙏 ॥ जय गणेशाय नमः ॥ 🙏

गणेश चतुर्थी 2026: 14 सितंबर, तिथि, मुहूर्त, पूजा विधि

Ganesh Chaturthi Vrat Date 2026: गणेश चतुर्थी 14 सितंबर 2026

साल भर में 12 विनायक चतुर्थियां आती हैं, और भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष चतुर्थी गणेश चतुर्थी के रूप में मनाई जाती है। यह हिंदू धर्म का सबसे बड़ा लोकोत्सव है जो पूरे 10 दिनों तक मनाया जाता है। गणेश पुराण, मुद्गल पुराण और स्कंद पुराण तीनों में इसी तिथि को भगवान गणेश के अवतरण दिवस के रूप में वर्णित किया गया है। महाराष्ट्र में इस उत्सव की अपूर्व धूम रहती है, किंतु अब यह सारे भारत और विश्व भर में हर्षोल्लास से मनाया जाता है।

गणेश चतुर्थी 2026: 14 सितंबर, सोमवार | चतुर्थी तिथि: 14 सितंबर प्रातः 7:07 से 15 सितंबर प्रातः 7:44 तक | भाद्रपद महीने, शुक्ल पक्ष

गणेश चतुर्थी 2026

इस वर्ष गणेश चतुर्थी सोमवार, 14 सितंबर 2026 को भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष में पड़ रही है। चतुर्थी तिथि का आरंभ 14 सितंबर को प्रातः 7:07 बजे होगा और समापन 15 सितंबर को प्रातः 7:44 बजे होगा। गणपति स्थापना और पूजा का सर्वोत्तम समय मध्याह्न मुहूर्त है जो प्रातः 11:02 बजे से दोपहर 1:31 बजे तक रहेगा। 14 सितंबर को प्रातः 7:08 बजे से रात्रि 8:04 बजे तक चंद्रमा न देखें। 10 दिन का यह उत्सव अनंत चतुर्दशी, 25 सितंबर को गणपति विसर्जन के साथ समाप्त होगा। आइए जानते हैं इस उत्सव का महत्व, पूजा विधि और व्रत कथा

ध्यान रखें: भारत के अलग-अलग स्थानों में पूजा मुहूर्त में थोड़ा अंतर हो सकता है। अपने स्थानीय पंचांग से पुष्टि अवश्य करें।


गणेश चतुर्थी का महत्व जाने

भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष चतुर्थी को गणेश चतुर्थी कहा जाता है। गणेश पुराण, मुद्गल पुराण और स्कंद पुराण तीनों में इस तिथि को भगवान गणेश के अवतरण दिवस के रूप में वर्णित किया गया है। यह केवल एक व्रत नहीं, बल्कि विघ्नहर्ता के जन्मोत्सव का महापर्व है। गणपति प्रथम पूज्य हैं, सभी देवताओं में सर्वप्रथम उन्हीं का नाम लिया जाता है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने स्वयं उन्हें यह वरदान दिया था कि किसी भी शुभ कार्य में पहले गणेश की पूजा होगी।

भाद्रपद का यह समय वर्षा ऋतु का अंतिम चरण है, जब प्रकृति नवजीवन से भरी होती है। इसी समय गणपति का जन्म हुआ, जो नई शुरुआत का प्रतीक है। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 1893 में इस पर्व को सार्वजनिक उत्सव का रूप दिया, जिससे यह राष्ट्रीय एकता और सामाजिक जागरण का माध्यम बन गया। आज महाराष्ट्र, कर्नाटक, गोवा, आंध्र प्रदेश और गुजरात में यह उत्सव दस दिनों तक धूमधाम से मनाया जाता है। मुंबई का लालबागचा राजा, पुणे के दगडूशेठ गणपति और मुंबई के सिद्धिविनायक मंदिर में लाखों भक्त दर्शन के लिए आते हैं। “गणपति बप्पा मोरया, पुढच्या वर्षी लवकर या” का उद्घोष पूरे वातावरण को भक्तिमय बना देता है।


Ganesh Chaturthi Vrat Puja Vidhi: गणेश चतुर्थी की पूजा विधि

  • ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ पीले या लाल वस्त्र धारण करें, क्योंकि गणपति पूजन में ये रंग शुभ माने जाते हैं।
  • घर के पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें और उत्तर-पूर्व दिशा में चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर गणेश की मूर्ति स्थापित करें।
  • मध्याह्न मुहूर्त (11:02 AM से 1:31 PM) में पूजा आरंभ करें, क्योंकि गणेश चतुर्थी पर मध्याह्न काल सर्वश्रेष्ठ है।
  • सबसे पहले गणपति का आवाहन करें और जल, अक्षत तथा फूल चढ़ाकर उन्हें आसन पर प्रतिष्ठित करें।
  • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गुड़) से गणपति को स्नान कराएं और लाल या पीले वस्त्र से उनका श्रृंगार करें।
  • 21 मोदक, तिल के लड्डू, केला, नारियल, गुड़ और 21 दूर्वा की गांठें गणेश जी को अर्पित करें, क्योंकि गणेश पुराण में ये विशेष रूप से अनुशंसित हैं।
  • धूप और दीप प्रज्वलित करके ॐ गं गणपतये नमः मंत्र का 108 बार जाप करें और मन को शांत रखते हुए श्रद्धा भाव से पूजन करें।
  • पूजा के अंत में गणेश आरती करें और परिवार के सभी सदस्य मिलकर आरती में भाग लें।
  • इस दिन गणेश चतुर्थी की व्रत कथा सुनना या पढ़ना अवश्य करें, क्योंकि कथा श्रवण के बिना व्रत अधूरा माना जाता है।
  • दिनभर सात्विक भोजन करें और संभव हो तो निर्जल व्रत रखें, साथ ही क्रोध और नकारात्मक विचारों से दूर रहने का प्रयास करें।
  • इस दिन तुलसी पत्र गणेश जी को न चढ़ाएं, क्योंकि शास्त्रों में इसका निषेध बताया गया है।
  • 14 सितंबर को प्रातः 7:08 से रात्रि 8:04 बजे तक चंद्रमा न देखें, यदि भूलवश दिख जाए तो श्याम स्तोत्र का पाठ करें।

Ganesh Chaturthi Vrat Katha: गणेश चतुर्थी की व्रत कथा

गणेश चतुर्थी कथा, माता पार्वती और गणेश जी का जन्म प्रसंग

एक बार माता पार्वती स्नान करने से पहले उन्होंने अपने शरीर के उबटन से एक बालक की आकृति बनाई और उसमें प्राण फूंक दिए। उस बालक को उन्होंने द्वार पर बैठाया और कहा, पुत्र, कोई भी भीतर न आने पाए। वह बालक द्वार पर डट गया।

॥ ॐ गं गणपतये नमः ॥

इतने में भगवान शिव आए। उस अपरिचित बालक ने उन्हें भी रोका। शिवजी क्रोधित हुए और उन्होंने अपने त्रिशूल से उस बालक का मस्तक काट दिया। माता पार्वती ने जब यह देखा, तो वे अत्यंत व्यथित हो गईं। उनके क्रोध को शांत करने के लिए भगवान शिव ने अपने गणों को उत्तर दिशा में जाकर पहला जो भी जीव मिले उसका मस्तक लाने की आज्ञा दी। गण गए और एक हाथी के बच्चे का मस्तक लाए।

भगवान शिव ने उस गज-मस्तक को उस बालक के धड़ पर जोड़ दिया और उसमें प्राण डाल दिए। देवताओं ने आनंद से पुष्पवर्षा की। भगवान शिव ने उस बालक को गणों का अधिपति, गणपति, बनाया। ब्रह्मा, विष्णु और इंद्र सहित सभी देवताओं ने गणपति को आशीर्वाद दिया कि तुम सभी शुभ कार्यों में प्रथम पूजित होगे।

जहाँ गणपति हैं, वहाँ विघ्न का वास नहीं।
जिसने बप्पा को मना लिया, उसका कोई काम अधूरा नहीं।

भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को गणेश जी के इस स्वरूप का दर्शन करने से
जीवन के समस्त विघ्न दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
॥ गणपति बप्पा मोरया ॥


गणेश चतुर्थी व्रत में जपे ये मंत्र

॥ जय गणेशाय नमः ॥

पूजा आरंभ से पहले - वक्रतुण्ड स्तोत्र (Mudgala Purana से)

श्री वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

पूजा के आरंभ में इसका पाठ करें। इसका अर्थ है कि हे वक्रतुण्ड गणेश, आप सूर्य के समान तेजस्वी हैं। कृपया मेरे सभी कार्यों को निर्विघ्न बनाएं।


मूल बीज मंत्र (Ganesha Maha Mantra - Mudgala Purana)

ॐ गं गणपतये नमः ॥

इस मंत्र का 108 बार जाप रुद्राक्ष या हल्दी की माला पर करें। यह गणेश जी का सबसे सिद्ध बीज मंत्र है।

जप विधि: मध्याह्न मुहूर्त में यह जप विशेष फलदायी है।


गणेश रूप के लिए विशेष मंत्र (Ganesha Purana से)

ॐ गणेशाय नमः ॥

इस मंत्र का जप करते समय गणेश जी के विघ्नहर्ता स्वरूप का ध्यान करें। हे गणेश, जो सभी विघ्नों को दूर करते हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूँ।


विघ्ननाशक मंत्र (Obstacle-Removing Mantra)

ॐ गं गौं गणपतये विघ्न विनाशिने स्वाहा ॥

किसी विशेष बाधा या समस्या के समाधान के लिए इस मंत्र का जप करें। हे गणपति, विघ्नों का नाश करने वाले, मैं आपको नमस्कार करता हूँ।


गणेश गायत्री मंत्र (Ganesha Gayatri - Mudgala Purana)

ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ॥

प्रातः और संध्या काल में इस मंत्र का जप बुद्धि और विद्या की वृद्धि करता है। हम एकदंत गणेश को जानते हैं, हम वक्रतुण्ड का ध्यान करते हैं। वह हाथी-मुखी देव हमें प्रेरित करें।


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गणेश चतुर्थी व्रत: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

गणेश चतुर्थी 2026 में कब है? गणेश चतुर्थी सोमवार, 14 सितंबर 2026 को है। चतुर्थी तिथि 14 सितंबर को प्रातः 7:07 बजे आरंभ होगी और 15 सितंबर को प्रातः 7:44 बजे समाप्त होगी। उदया-तिथि के अनुसार व्रत 14 सितंबर को ही रखा जाएगा।

गणेश चतुर्थी को गणपति का जन्मदिन क्यों कहते हैं? गणेश पुराण, मुद्गल पुराण और स्कंद पुराण में भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को भगवान गणेश के अवतरण दिवस के रूप में वर्णित किया गया है। इसी दिन माता पार्वती ने गणेश को जन्म दिया था, इसलिए यह उनका जन्मदिन माना जाता है।

पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है? गणेश स्थापना और पूजा का सर्वोत्तम समय मध्याह्न मुहूर्त है जो 14 सितंबर 2026 को प्रातः 11:02 बजे से दोपहर 1:31 बजे तक रहेगा। इसी समय में गणपति की प्रतिमा स्थापित करना विशेष फलदायी है।

गणेश चतुर्थी पर चंद्रमा क्यों नहीं देखना चाहिए? पुराणों में वर्णित है कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चंद्रमा देखने से मिथ्या कलंक लगता है। 14 सितंबर 2026 को प्रातः 7:08 बजे से रात्रि 8:04 बजे तक चंद्रमा न देखें। यदि भूलवश दिख जाए तो श्याम स्तोत्र का पाठ करें।

गणेश चतुर्थी के दिन क्या भोग चढ़ाएं? गणेश जी को 21 मोदक का भोग लगाना सर्वोत्तम है। इसके अतिरिक्त तिल के लड्डू, केला, नारियल, गुड़ और पंचमेवा भी अर्पित करें। 21 दूर्वा की गांठें चढ़ाना अनिवार्य है।

गणेश उत्सव कितने दिन तक चलता है? गणेश उत्सव 10 दिन तक चलता है। 14 सितंबर 2026 को गणेश स्थापना होती है और अनंत चतुर्दशी 25 सितंबर 2026 को गणपति विसर्जन होता है। इन 10 दिनों में प्रतिदिन सुबह-शाम गणपति की आरती की जाती है।

गणेश चतुर्थी व्रत में कौन सी कथा सुनी जाती है? इस व्रत में माता पार्वती द्वारा गणेश जी के जन्म की कथा सुनी जाती है। कथा में बताया जाता है कि कैसे माता पार्वती ने अपने शरीर के उबटन से गणेश को बनाया और शिव जी ने उन्हें गणों का अधिपति बनाया।

गणेश चतुर्थी व्रत में कौन सा मंत्र सबसे महत्वपूर्ण है? इस व्रत में ॐ गं गणपतये नमः गणेश जी का सबसे सिद्ध बीज मंत्र माना जाता है। इसका 108 बार जाप रुद्राक्ष या हल्दी की माला पर करना विशेष फलदायी है।

क्या इस दिन व्रत रखना आवश्यक है? गणेश चतुर्थी मुख्यतः पूजन का पर्व है। व्रत रखना वैकल्पिक है किंतु यदि आप व्रत रखें तो सात्विक भोजन करें। दिनभर क्रोध और नकारात्मक विचारों से दूर रहें और गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें।


॥ गणपति बप्पा मोरया, मंगलमूर्ति मोरया ॥

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