गजानन संकष्टी चतुर्थी 2026: 2 अगस्त तिथि, पूजा विधि, कथा और मंत्र
Gajanana Sankashti Chaturthi Vrat Date 2026: 2 अगस्त 2026 - गजानन संकष्टी चतुर्थी व्रत 2026 में कब है?
श्रावण कृष्ण चतुर्थी को गजानन संकष्टी चतुर्थी व्रत रखा जाता है। “गजानन” अर्थात गज के समान मुख वाले, भगवान गणेश का यह सबसे प्रचलित स्वरूप है जो स्थिरता, शक्ति और समभाव का प्रतीक है। श्रावण मास भगवान शिव का प्रिय मास है और इस मास में की गई पूजा का फल कई गुना होता है, इसलिए इस संकष्टी का पुण्य और भी अधिक है।
गजानन संकष्टी चतुर्थी 2026: 2 अगस्त, रविवार | चतुर्थी तिथि: 1 अगस्त रात्रि 11:07 से 2 अगस्त रात्रि 11:15 तक | चंद्रोदय: 2 अगस्त रात्रि 9:39 बजे | श्रावण कृष्ण पक्ष

इस बार यह व्रत रविवार, 2 अगस्त 2026 को पड़ रहा है। श्रावण कृष्ण चतुर्थी तिथि 1 अगस्त को रात्रि 11:07 बजे लगती है और 2 अगस्त को रात्रि 11:15 बजे समाप्त होती है। 2 अगस्त को सूर्योदय के समय यह तिथि चल रही होगी, इसलिए उदया तिथि नियम से व्रत 2 अगस्त को ही रखा जाएगा। व्रत का पारण उसी रात 9:39 बजे चंद्रोदय के बाद होगा। चंद्रमा दिखने पर तांबे के पात्र में जल, दूध या गंगाजल लेकर चंद्रदेव को अर्घ्य दें, फिर सात्विक भोजन करें। आइए जानते हैं गजानन संकष्टी का महत्त्व, पूजा विधि और व्रत कथा।
ध्यान रखें: भौगोलिक स्थिति के कारण भारत के अलग-अलग स्थानों में चंद्रोदय का समय अलग हो सकता है। सटीक जानकारी के लिए अपने स्थानीय पंचांग जरूर देखें।
गजानन संकष्टी चतुर्थी का महत्व
गजानन, गज के समान विशाल मुख, विस्तृत कान और शांत, स्थिर देह। भगवान गणेश के बत्तीस स्वरूपों में गजानन वह रूप है जिसे भक्त सहज ही पहचानते हैं और जिसकी छाया में आकर उन्हें अपनापन मिलता है। मुद्गल पुराण में वर्णित है कि गजानन अवतार का उद्देश्य लोभ के उस दैत्य का दमन करना था जो एक बार समस्त देवलोक को निगल गया था।
लोभासुर नामक उस दैत्य ने भगवान शिव की तपस्या से ऐसे वरदान पाए कि देवता उसके सामने असहाय हो गए। कुबेर के अहंकार और कामना से उत्पन्न इस दैत्य ने तीनों लोकों पर आधिपत्य जमा लिया। तब देवों ने महर्षि रैभ्य के निर्देश पर गजानन गणेश की शरण ली। गजानन ने शस्त्र नहीं उठाया, नारद के माध्यम से लोभासुर को अपनी सामर्थ्य का बोध कराया। दैत्य स्वयं गणेश के चरणों में आ गिरा। श्रावण मास में जहाँ शिवजी की उपासना अपने चरम पर होती है, वहाँ उनके प्रिय पुत्र गजानन की आराधना का भी अलग ही माहात्म्य है। धर्म सिंधु में इस व्रत को गृहस्थ जीवन में स्थिरता और लोभ से मुक्ति का श्रेष्ठ साधन कहा गया है। जो भक्त इस दिन निष्काम भाव से उपवास रखता है, चंद्रोदय पर अर्घ्य देता है और कथा सुनता है, उसके भीतर का लोभ और अशांति धीरे-धीरे शांत होती है।
Gajanana Sankashti Chaturthi Vrat Puja Vidhi: गजानन संकष्टी चतुर्थी व्रत की पूजा विधि
- 2 अगस्त को ब्रह्ममुहूर्त में उठें, स्नान कर लाल या पीले वस्त्र पहनें। यह रंग गणपति पूजन में शुभ माने जाते हैं।
- व्रत का संकल्प लें — मन में या स्पष्ट वाणी से कहें कि आज सूर्योदय से चंद्रोदय तक गजानन गणेश की आराधना के लिए यह उपवास रखता/रखती हूं।
- पूजा स्थल को साफ करें। उत्तर-पूर्व कोण में एक चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें।
- पूजा सामग्री तैयार रखें: शुद्ध जल, गंगाजल, रोली, चंदन, सिंदूर, अक्षत, 21 दूर्वा की गांठें, लाल व पीले फूल, घी का दीपक, धूप, कपूर, नारियल, मोदक, तिल के लड्डू और मौसमी फल।
- दीपक और धूप प्रज्वलित करें। गणपति को जल से आचमन कराएं, फिर क्रम से अक्षत, रोली, चंदन, सिंदूर, दूर्वा और लाल फूल अर्पित करें। गणेश जी को तुलसी कभी न चढ़ाएं।
- भोग में मोदक और तिल के लड्डू रखें। गुड़, नारियल और मौसमी फल भी अर्पित कर सकते हैं।
- ॐ गजाननाय नमः और ॐ गं गणपतये नमः का 108 बार जप करें।
- संध्याकाल में पुनः पूजन करें। गजानन संकष्टी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें, फिर गणेश आरती करें।
- रात्रि 9:39 बजे चंद्रोदय पर खुले आकाश में जाएं। तांबे के पात्र में जल, दूध या गंगाजल लेकर चंद्रमा की ओर मुख करके अर्घ्य अर्पित करें।
- अर्घ्य के बाद गणपति से प्रार्थना कर सात्विक भोजन से व्रत खोलें। फल, खीर या हल्का घर का खाना उचित है।
- क्या न करें: प्याज, लहसुन, मांसाहार और नशा वर्जित है। तुलसी न चढ़ाएं। चंद्रोदय से पहले व्रत न तोड़ें।
Gajanana Sankashti Chaturthi Vrat Katha: गजानन संकष्टी चतुर्थी व्रत की कथा

मुद्गल पुराण के चतुर्थ स्कन्ध में गजानन चरित का वर्णन है। एक बार देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर कैलाश पर्वत पर भगवान शिव और माता पार्वती के दर्शन को आए। शिवजी की आज्ञा लेकर जब वे आसन पर बैठे, उनकी दृष्टि एक क्षण के लिए माता पार्वती पर पड़ गई। पार्वती जी के कोप से कुबेर थर्रा उठे। उसी व्याकुलता और भय से एक शक्तिशाली प्राणी प्रकट हुआ, जो लोभ का मूर्त रूप था। यही लोभासुर कहलाया।
लोभासुर असुरगुरु शुक्राचार्य के पास गया और दीक्षा ग्रहण की। उसने “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का कठोर जाप करते हुए तपस्या की। शिवजी प्रसन्न हुए और उसे निर्भयता का वर दिया। वरदान पाते ही लोभासुर का दर्प बढ़ता चला गया। उसने स्वर्ग पर चढ़ाई की, इन्द्र को परास्त किया, वैकुण्ठ पर अधिकार जमाया और अंत में कैलाश पर भी अपना झंडा फहरा दिया। ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों लोकों में भय का साया छा गया। देवता दर-दर भटकने लगे।
पराजित देव महर्षि रैभ्य के पास पहुंचे। ऋषि ने उन्हें बताया कि केवल गजानन गणेश ही इस संकट का समाधान कर सकते हैं। देवों ने एकमन होकर गजानन की उपासना की। उनकी पुकार सुनकर गणेश जी ने नारद मुनि को लोभासुर के पास शांति-दूत बनाकर भेजा। नारद ने लोभासुर की सभा में पहुँचकर कहा: “तुमने शिवजी के वरदान से तीनों लोक जीते हैं। पर जानते हो, जिस शक्ति के बल पर खड़े हो, वह गजानन के केवल एक नेत्र के सामने दीपक जितनी भी नहीं।” लोभासुर हँसा और बोला: “नारद, मैंने ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों को हराया है। मुझे किससे भय?” नारद लौट गए और वास्तविकता बता दी। तब गजानन स्वयं प्रकट हुए। न कोई सेना थी, न रण-वाद्य। केवल उनकी विशाल देह, उनकी शांत पर गहरी आँखें और उस गजमुख की गरिमा। लोभासुर ने उन्हें देखा। उसके भीतर कुछ टूटने लगा। वह बल जिसके सहारे वह इतने समय से खड़ा था, अचानक खोखला लगने लगा। उसे बोध हुआ कि उसने जो पाया वह लोभ से पाया, और जो लोभ से मिलता है वह कभी स्थायी नहीं होता। वह गजानन के चरणों में झुक गया और क्षमा माँगी। गजानन ने उसे क्षमा किया। देव अपने-अपने स्थानों को लौटे और तीनों लोकों में फिर से धर्म का प्रकाश फैला।
लोभ कितना भी बड़ा हो, ज्ञान और शरणागति के सामने टिक नहीं सकता।
गजानन की कृपा उसे प्राप्त होती है जो अहंकार और कामना छोड़कर उनके द्वार आता है।
जो भक्त श्रावण की गजानन संकष्टी पर उपवास रखता है और इस कथा को श्रद्धा से सुनता है,
उसके जीवन से लोभ और मानसिक अशांति दूर होती है, गणपति की विशेष कृपा मिलती है।
॥ गणपति बप्पा मोरया ॥
गजानन संकष्टी चतुर्थी व्रत में जपे ये मंत्र
॥ जय गणेशाय नमः ॥
गजानन नाम मंत्र
ॐ गजाननाय नमः ॥
गजानन स्तुति (मुद्गल पुराण, खण्ड ४)
नमस्ते गजवक्त्राय गजाननसुरूपिणे।
अनादिगणनाथाय स्वानन्दावासिने नमः ॥
रजसा सृष्टिकर्ते ते सत्त्वतः पालकाय वै।
तमसा सर्वसंहर्त्रे गणेशाय नमो नमः ॥
मूल बीज मंत्र (गणपत्यथर्वशीर्ष)
ॐ गं गणपतये नमः ॥
गणेश गायत्री मंत्र
ॐ एकदन्ताय विद्महे।
वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥
विघ्ननाशक मंत्र
ॐ गं गौं गणपतये विघ्न विनाशिने स्वाहा ॥
पूजा आरंभ श्लोक
श्री वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
चंद्रोदय अर्घ्य मंत्र
गगनार्णवमाणिक्य चन्द्र दाक्षायणीपते।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं गणेशप्रतिरूपक ॥
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गजानन संकष्टी चतुर्थी व्रत: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
गजानन संकष्टी चतुर्थी व्रत अगस्त 2026 में कब है?
गजानन संकष्टी चतुर्थी व्रत रविवार, 2 अगस्त 2026 को है। श्रावण कृष्ण चतुर्थी तिथि 1 अगस्त को रात्रि 11:07 बजे आरंभ होती है और 2 अगस्त को रात्रि 11:15 बजे समाप्त होती है। चंद्रोदय रात्रि 9:39 बजे होगा।
व्रत का पारण कब करें?
पारण 2 अगस्त की रात्रि 9:39 बजे चंद्रोदय के बाद करें। पहले चंद्रमा को जल, दूध या गंगाजल से अर्घ्य दें, फिर सात्विक भोजन से व्रत खोलें।
इसे गजानन संकष्टी क्यों कहते हैं?
श्रावण मास की कृष्ण पक्ष चतुर्थी पर गणेश जी के गजानन स्वरूप की पूजा होती है। गजानन का अर्थ है हाथी के समान मुख वाले, यह उनका सबसे पहचाना जाने वाला स्वरूप है।
श्रावण मास में संकष्टी का क्या विशेष महत्व है?
श्रावण मास भगवान शिव का प्रिय मास है। इस मास में की गई हर पूजा और व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है। श्रावण की गजानन संकष्टी में शिव-पुत्र गणेश की पूजा इसे और भी पुण्यदायी बनाती है।
गणेश जी को कौन सा भोग लगाएं?
मोदक और तिल के लड्डू इस व्रत का विशेष भोग हैं। नारियल, गुड़, फल और 21 दूर्वा की गांठें भी अर्पित करें।
गजानन संकष्टी पर कौन सा मंत्र जपें?
ॐ गजाननाय नमः यह गजानन का विशेष नाम मंत्र है। इसके साथ ॐ गं गणपतये नमः का 108 बार जप करें। गणेश गायत्री मंत्र का पाठ भी करें।
संकष्टी व्रत में गणेश जी को तुलसी क्यों नहीं चढ़ाते?
पुराणों की कथा के अनुसार तुलसी और गणेश जी के बीच एक शाप का प्रसंग है, जिसके कारण गणेश पूजन में तुलसी वर्जित है। इसके बदले दूर्वा चढ़ाएं, यह गणपति को सबसे प्रिय है।
क्या महिलाएं भी गजानन संकष्टी व्रत रख सकती हैं?
हाँ, गजानन संकष्टी चतुर्थी व्रत महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए समान रूप से फलदायी है। परिवार के सभी सदस्य मिलकर यह व्रत कर सकते हैं।
॥ गणपति बप्पा मोरया, मंगलमूर्ति मोरया ॥


