एकदंत अंगारकी संकष्टी गणेश चतुर्थी 2026 - 5 मई तिथि, पूजा विधि, मंत्र और व्रत कथा
मई 2026 में एकदंत (अंगारकी) संकष्टी गणेश चतुर्थी कब है?
एकदंत (अंगारकी) संकष्टी गणेश चतुर्थी - मंगलवार, 05 मई 2026 | चंद्रोदय: रात्रि 10:22 बजे

संकष्टी गणेश चतुर्थी हर मास कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाई जाती है, जब भक्त भगवान गणेश की आराधना कर जीवन के कष्टों से मुक्ति पाने की कामना करते हैं। जब यह चतुर्थी मंगलवार को पड़े, तो इसे अंगारकी चतुर्थी कहते हैं। गणेश पुराण के उपासना खंड के अनुसार, पृथ्वी-पुत्र अंगारक (भौम) ने हजारों वर्षों तक भगवान गणेश की कठोर तपस्या की। माघ कृष्ण चतुर्थी, मंगलवार के दिन गणेश जी ने दर्शन देकर वर माँगने को कहा, तो अंगारक ने केवल यही माँगा कि उनका नाम सदा के लिए गणेश जी के नाम के साथ जुड़ा रहे। भगवान ने वरदान दिया कि इस दिन व्रत रखने वाले को वर्षभर की संकष्टी चतुर्थी के समान फल मिलेगा, और तभी से यह तिथि अंगारकी चतुर्थी कहलाई। मई 2026 में यह व्रत ज्येष्ठ मास में पड़ रहा है, इसलिए पूजित स्वरूप एकदंत है, जो एकाग्रता और अद्वैत शक्ति के प्रतीक हैं। व्रत की तिथि मंगलवार, 5 मई 2026 है। कृष्ण पक्ष चतुर्थी तिथि प्रातः 5:24 बजे (सूर्योदय से पूर्व) आरंभ होती है और 6 मई को प्रातः 7:51 बजे समाप्त होती है। उदया तिथि के अनुसार व्रत 5 मई को ही रखा जाएगा। संध्या पूजा का शुभ मुहूर्त सायं 6:33 बजे से रात्रि 8:57 बजे तक है। व्रत का पारण रात्रि 10:22 बजे चंद्रोदय के बाद, चंद्रदेव को जल, दूध या गंगाजल का अर्घ्य देकर ही करें। आइए जानते हैं इस व्रत का महत्व, पूजा विधि और व्रत कथा।
ध्यान रखें: भौगोलिक स्थिति के कारण भारत के अलग-अलग स्थानों में सूर्योदय और सूर्यास्त का समय अलग हो सकता है। इसलिए सटीक जानकारी के लिए अपने स्थानीय पंचांग या खगोलीय विवरण जरूर देखें।
एकदंत (अंगारकी) संकष्टी चतुर्थी का महत्व जाने
गणेश पुराण और स्मृति कौस्तुभ में संकष्टी चतुर्थी को सभी व्रतों में विशेष स्थान दिया गया है। जब यह तिथि मंगलवार को पड़े और ज्येष्ठ माह की कृष्ण पक्ष चतुर्थी हो, तो इसका फल कई गुना बढ़ जाता है।
भगवान गणेश को चतुर्थी तिथि अत्यंत प्रिय है। संकष्टी का अर्थ ही है कठिन समय से मुक्ति, और इस दिन जो भक्त श्रद्धापूर्वक व्रत करते हैं, उनके जीवन के विघ्न, बाधाएं और संकट धीरे-धीरे दूर होने लगते हैं। अंगारकी चतुर्थी का विशेष महत्व इसलिए भी है क्योंकि इसमें गणेश जी की शक्ति के साथ मंगल ग्रह का प्रभाव भी जुड़ जाता है। मंगल दोष से पीड़ित व्यक्तियों के लिए यह व्रत बेहद लाभकारी है। गणेश पुराण में स्वयं गणेश जी ने वरदान दिया है कि इस दिन व्रत रखने वाले को वर्षभर की संकष्टी चतुर्थी करने के समान पुण्य मिलेगा।
संतान प्राप्ति की इच्छा हो, विवाह में विलंब हो, कार्यों में बार-बार विघ्न आता हो या कुंडली में मांगलिक दोष हो - इन सभी स्थितियों में यह व्रत विशेष रूप से फलदायी रहा है। ज्येष्ठ माह में एकदंत स्वरूप की पूजा होती है, जो एकाग्रता और द्वंद्व से मुक्ति के प्रतीक हैं।
संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत की पूजा विधि जाने
- व्रत के दिन सूर्योदय से पहले उठें। स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें, लाल या पीले रंग के वस्त्र इस दिन विशेष माने गए हैं।
- स्नान के बाद हाथ में जल, अक्षत और दूर्वा लेकर भगवान गणेश के सामने व्रत का संकल्प लें। संकल्प में अपना नाम, गोत्र और मनोकामना मन में स्मरण करते हुए बोलें: “मम सर्वकर्मसिद्धये सिद्धिविनायक पूजनमहं करिष्ये।”
- पूजा स्थान पर लकड़ी की चौकी बिछाएं, उस पर लाल कपड़ा रखें और भगवान एकदंत की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। ज्येष्ठ माह में एकदंत स्वरूप की ही पूजा का विधान है।
- गणेश जी को गंगाजल या शुद्ध जल से अभिषेक करें। इसके बाद सिंदूर, चंदन, अक्षत, लाल फूल और दूर्वा की 21 गांठें अर्पित करें। नारद पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि संकष्टी चतुर्थी पर दूर्वा चढ़ाना अनिवार्य है, परंतु तुलसी पत्र कभी न चढ़ाएं।
- घी का दीपक और धूप-अगरबत्ती जलाएं। मोदक, लड्डू और ऋतु फल का भोग लगाएं। गणेश जी को तिल और गुड़ भी अर्पित कर सकते हैं, अंगारकी चतुर्थी पर तिल का विशेष महत्व है।
- गणेश मंत्रों का जाप करें। “ॐ गं गणपतये नमः” का 108 बार जाप रुद्राक्ष या हल्दी की माला पर करें। जाप के समय मुख पूर्व या उत्तर दिशा में रखें।
- दिनभर अन्न ग्रहण न करें। फल, दूध, साबूदाना, आलू और मूंगफली ले सकते हैं। अनाज, चावल और दाल का सेवन वर्जित है।
- सायंकाल संध्याकाल में, सूर्यास्त के बाद पुनः गणेश जी की पूजा करें। इस समय अंगारकी व्रत कथा का पाठ अवश्य करें या किसी से सुनें, कथा श्रवण के बिना व्रत अधूरा रहता है।
- गणेश आरती करें और परिवार सहित प्रसाद वितरण करें।
- रात्रि में चंद्रोदय पर (5 मई को रात्रि लगभग 10:22 बजे) खुले स्थान पर आएं। लोटे में जल, दूध या गंगाजल लें और चंद्रमा की ओर धारा बहाते हुए अर्घ्य दें। अर्घ्य देते समय नीचे की ओर दृष्टि रखें या जल की धार के बीच से चंद्रमा के दर्शन करें। “ॐ सोम सोमाय नमः” बोलते हुए चंद्रदेव को प्रणाम करें।
- चंद्र दर्शन और अर्घ्य के बाद ही व्रत का पारण करें। सामर्थ्य अनुसार किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन या दान देकर फिर स्वयं भोजन ग्रहण करें। गणेश पुराण में कहा गया है कि चंद्र दर्शन से पहले व्रत तोड़ने पर व्रत का पूर्ण फल नहीं मिलता।
- व्रत के दिन क्रोध, असत्य भाषण और कलह से बचें। मन में किसी के प्रति द्वेष न रखें। इस दिन भूमि पर सोने और ब्रह्मचर्य पालन का विशेष महत्व बताया गया है।
एकदंत (अंगारकी) संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत कथा
गणेश पुराण के उपासना खंड के साठवें अध्याय में इस व्रत की मूल कथा वर्णित है। प्राचीन काल में अवंती नगरी में महर्षि भारद्वाज रहते थे, जो गणेश के परम भक्त और वेदों के ज्ञाता थे। एक बार वे क्षिप्रा नदी के तट पर स्नान के लिए गए, वहां एक अप्सरा जलक्रीड़ा कर रही थी। उनका तेज भूमि पर गिरा और पृथ्वी माता ने उसे धारण किया। इस प्रकार पृथ्वी की कोख से एक तेजस्वी बालक का जन्म हुआ, जिसका रंग जास्वंद के फूल जैसा लाल था। पृथ्वी ने उस बालक का सात वर्ष तक पालन-पोषण किया, फिर उसे ऋषि भारद्वाज को सौंप दिया। ऋषि ने उसे वेद-पुराणों का ज्ञान दिया और गणपति मंत्र की दीक्षा भी दी।
बालक के मन में भगवान गणेश के दर्शन की तीव्र अभिलाषा जागी। पिता की आज्ञा लेकर वह नर्मदा नदी के तट पर चला गया और वहां पद्मासन में बैठकर निराहार रहते हुए गणेश मंत्र का जप आरंभ किया। वर्षों बीतते गए, शरीर क्षीण होता गया, किंतु उसकी भक्ति तनिक भी नहीं डिगी। हजारों वर्षों की कठोर तपस्या के बाद माघ कृष्ण चतुर्थी के दिन, जब चंद्रमा उदित हुआ, तब भगवान गणेश दिव्य वस्त्र धारण किए, करोड़ों सूर्यों की आभा लिए प्रकट हुए। उनके मस्तक पर चंद्रमा विराजमान था, एक दंत सुशोभित था। उस तपस्वी बालक ने गद्गद कंठ से उनकी स्तुति की और उनके चरणों में लोट गया।
भगवान गणेश ने प्रसन्न होकर वर माँगने को कहा। बालक ने तीन वर माँगे, देवत्व की प्राप्ति हो, तीनों लोकों में शुभ ग्रह के रूप में ख्याति मिले, और गणेश जी के नाम के साथ उसका नाम सदा के लिए जुड़ा रहे। गजानन ने तथास्तु कहा और घोषणा की, “तुम पृथ्वी के पुत्र हो इसलिए भौम कहलाओगे, तुम्हारा रंग अंगार जैसा लाल है इसलिए अंगारक नाम से प्रसिद्ध होगे, और मंगल गुण होने से मंगल भी कहलाओगे। आज की यह तिथि अंगारक चतुर्थी के नाम से जानी जाएगी। जो मनुष्य इस दिन मेरा व्रत करेगा उसे वर्षभर की संकष्टी चतुर्थी का फल मिलेगा, उसके किसी भी कार्य में विघ्न नहीं आएगा।” इतना कहकर गजमुख अंतर्ध्यान हो गए। अंगारक ने सशरीर स्वर्ग की प्राप्ति की और देवताओं के साथ अमृतपान किया। तभी से यह पवित्र तिथि अंगारकी चतुर्थी के नाम से युगों-युगों तक पूजित होती चली आ रही है।
संकष्टी चतुर्थी पर पढ़े जाने वाले मंत्र
॥ जय गणेशाय नमः ॥
मूल बीज मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः ॥
इस मंत्र का 108 बार जाप रुद्राक्ष या हल्दी की माला पर करें। यह गणेश जी का सबसे सिद्ध बीज मंत्र है।
गणेश गायत्री मंत्र (एकदंत स्वरूप के लिए विशेष)
ॐ एकदंताय विद्महे ।
वक्रतुण्डाय धीमहि ।
तन्नो दंती प्रचोदयात् ॥
ज्येष्ठ माह की संकष्टी चतुर्थी पर भगवान एकदंत की उपासना का विधान है, इसलिए यह गायत्री मंत्र विशेष रूप से फलदायी रहता है।
ध्यान श्लोक
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
पूजा आरंभ करने से पहले और संकल्प लेते समय इस श्लोक का पाठ करें।
विघ्ननाशक मंत्र (अंगारकी चतुर्थी पर विशेष जाप)
ॐ गं गौं गणपतये विघ्न विनाशिने स्वाहा ॥
एकदंत नामस्तुति मंत्र
एकदंताय शुद्धाय सुमुखाय नमो नमः ।
प्रपन्न जनपालाय प्रणतार्ति विनाशिने ॥
संकटनाशन स्तोत्र का प्रथम श्लोक (नारद पुराण)
प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् ।
भक्तावासं स्मरेन्नित्यमायुःकामार्थसिद्धये ॥
इन मंत्रों का जप विशेष रूप से संकट निवारण और मानसिक शांति प्रदान करता है।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
अंगारकी चतुर्थी 2026 कब है?
5 मई 2026, मंगलवार को। कृष्ण पक्ष चतुर्थी तिथि प्रातः 5:24 बजे से आरंभ होती है।
एकदंत संकष्टी चतुर्थी का व्रत कब तोड़ें?
रात्रि 10:22 बजे चंद्रोदय के बाद, चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करें।
अंगारकी चतुर्थी क्यों कहते हैं इसे?
गणेश पुराण के अनुसार ऋषि अंगारक ने इसी तिथि पर गणेश जी से वरदान माँगा था कि उनका नाम इस चतुर्थी के साथ सदा जुड़ा रहे।
ज्येष्ठ माह की संकष्टी चतुर्थी पर कौन से स्वरूप की पूजा होती है?
ज्येष्ठ माह में भगवान एकदंत की पूजा का विधान है।


