उत्पन्ना एकादशी 2026: 4 दिसंबर व्रत तिथि, एकादशी माता प्राकट्य कथा, पूजा विधि
Utpanna Ekadashi Vrat Date 2026: उत्पन्ना एकादशी 4 दिसंबर 2026 को कब है?
उत्पन्ना एकादशी वर्ष की चौबीस एकादशियों में वह विशेष तिथि है जिस दिन एकादशी देवी का स्वयं प्राकट्य हुआ था। मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की इस एकादशी को समस्त एकादशियों की जननी कहा जाता है और भगवान श्रीकृष्ण का प्रिय मार्गशीर्ष मास इसके महत्व को और गहरा करता है।
उत्पन्ना एकादशी 2026: 4 दिसंबर, शुक्रवार | एकादशी तिथि: 3 दिसंबर रात्रि 11:03 बजे से 4 दिसंबर रात्रि 11:44 बजे तक | पारण: 5 दिसंबर प्रातः 6:58 से 9:05 बजे | मार्गशीर्ष (अगहन) माह, कृष्ण पक्ष

इस वर्ष उत्पन्ना एकादशी शुक्रवार, 4 दिसंबर 2026 को मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष में पड़ रही है। एकादशी तिथि का आरंभ 3 दिसंबर को रात्रि 11:03 बजे होगा और समापन 4 दिसंबर को रात्रि 11:44 बजे होगा। उदया तिथि के अनुसार व्रत 4 दिसंबर को ही रखा जाएगा। पारण 5 दिसंबर को प्रातः 6:58 बजे से 9:05 बजे के मध्य करें। भारत के अलग-अलग स्थानों में सूर्योदय का समय भिन्न हो सकता है, इसलिए सटीक पारण समय के लिए स्थानीय पंचांग अवश्य देखें। आइए जानते हैं उत्पन्ना एकादशी का महत्व, पूजाविधि और व्रत कथा।
उत्पन्ना एकादशी का महत्व जाने
मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की उत्पन्ना एकादशी वर्ष की चौबीस एकादशियों में सबसे मूल और सबसे प्राचीन है। यह वह तिथि है जिस दिन एकादशी देवी का स्वयं प्राकट्य हुआ था, इसीलिए इसे समस्त एकादशियों की जननी कहते हैं।
एकादशी देवी भगवान विष्णु की योगमाया शक्ति हैं। जिस दिन वे प्रकट हुईं उसी दिन से यह व्रत जगत में स्थापित हुआ। जो भक्त पहली बार एकादशी व्रत का संकल्प लेना चाहते हैं, शास्त्रों में उनके लिए उत्पन्ना एकादशी से वार्षिक व्रत-क्रम आरंभ करना सबसे शुभ बताया गया है। इस एकादशी के व्रत का पुण्यफल सौ अश्वमेध यज्ञों के समतुल्य माना गया है। भगवान विष्णु ने स्वयं एकादशी देवी को वरदान देते हुए कहा था कि जो भी मनुष्य इस दिन व्रत रखेगा, वह समस्त पापों से मुक्त होकर वैकुण्ठ को प्राप्त होगा। श्रीकृष्ण ने गीता में मार्गशीर्ष मास को अपना स्वरूप बताया है, इसलिए इसी मास में पड़ने वाली उत्पन्ना एकादशी का महत्व और भी गहरा हो जाता है। जो साधक जीवन भर एकादशी व्रत करना चाहते हों, वे इसी तिथि से संकल्प लें, क्योंकि एकादशी माता के प्राकट्य दिवस पर किया गया संकल्प भगवान के सामने सबसे दृढ़ और पवित्र माना जाता है।
Utpanna Ekadashi Vrat Puja Vidhi: उत्पन्ना एकादशी व्रत की पूजा विधि
- दशमी (3 दिसंबर) की संध्या से पहले सात्विक और हल्का भोजन करें। चावल, उड़द दाल, प्याज, लहसुन और तामसिक भोजन पूरी तरह वर्जित हैं। यही अंतिम भोजन होगा, इसलिए पौष्टिक पर सुपाच्य चुनें।
- दशमी की रात्रि मन को भगवान विष्णु के स्मरण में लगाएं। अगले दिन के संकल्प के लिए चित्त को शांत और विचारों को पवित्र रखें। अधिक जागरण से बचें ताकि एकादशी का व्रत शरीर पर भारी न पड़े।
- एकादशी (4 दिसंबर) को सूर्योदय से पहले स्नान करें, स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें। भगवान विष्णु या शालिग्राम की प्रतिमा के सामने बैठकर उत्पन्ना एकादशी व्रत का संकल्प लें।
- पूजा में तुलसी दल, पीले पुष्प, चंदन, पंचामृत, धूप और घी का दीपक अर्पित करें। तुलसी के बिना भगवान विष्णु की पूजा अधूरी मानी जाती है, इसलिए तुलसी दल का विशेष ध्यान रखें।
- मंत्र जाप के लिए ॐ नमो भगवते वासुदेवाय का 108 बार जप करें। विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना इस दिन बहुत फलदायी है।
- व्रत कथा का श्रवण या पाठ अवश्य करें। उत्पन्ना एकादशी की व्रत कथा भविष्यपुराण पर आधारित है और इसे सुनने मात्र से व्रत का पूर्ण फल मिलता है।
- दिन भर अन्न का त्याग रखें। क्रोध, व्यर्थ वार्तालाप और निद्रा से बचें। मन को भजन, कीर्तन या विष्णु नाम स्मरण में लगाए रखें।
- दान का विशेष महत्व है इस दिन। ब्राह्मण को अन्न, वस्त्र और दक्षिणा दें। दिसंबर की शीत ऋतु में गर्म वस्त्र और भोजन का दान जरूरतमंदों को करें, इससे व्रत का पुण्य कई गुना बढ़ता है।
- रात्रि जागरण करें और भगवान विष्णु के भजनों में समय व्यतीत करें। यदि पूर्ण जागरण संभव न हो तो कुछ समय विष्णु चालीसा या सहस्रनाम के पाठ में अवश्य लगाएं।
- पारण (5 दिसंबर) प्रातः 6:58 बजे से 9:05 बजे के बीच करें। पहले हरि वासर की समाप्ति की प्रतीक्षा करें, फिर तुलसी दल युक्त जल से व्रत तोड़ें। पारण में देरी न करें और द्वादशी तिथि के भीतर ही उपवास खोलें।
- पारण के दिन किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन और वस्त्र दान करें। यह कार्य व्रत के पुण्य को और अधिक सुदृढ़ करता है और व्रत को पूर्णता प्रदान करता है।
Utpanna Ekadashi Vrat Katha: उत्पन्ना एकादशी की व्रत कथा

सतयुग में मुर नाम का एक महाबलशाली असुर था। उसने अपनी असाधारण शक्ति से स्वर्गलोक पर आक्रमण किया और इंद्र सहित समस्त देवताओं को पराजित कर वहाँ से खदेड़ दिया। देवतागण निराश और हताश होकर भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे। भगवान ने देवताओं की पुकार सुनी और मुरासुर से युद्ध आरंभ किया। यह संग्राम असाधारण था। दस हजार वर्षों तक दोनों के बीच घमासान युद्ध चला, किंतु मुरासुर का अंत नहीं हुआ। भगवान विष्णु भी इस दीर्घ युद्ध से कुछ थके और बद्रीकाश्रम के निकट हेमवती नामक एक गुफा में विश्राम के लिए चले गए।
मुरासुर ने यह अवसर देखा और सोया हुआ जानकर भगवान पर प्रहार करने की योजना बनाई। वह गुफा में घुसा। किंतु जैसे ही वह भगवान विष्णु के निकट पहुँचा, तभी भगवान के दिव्य तेज से एक अद्भुत शक्ति प्रकट हुई। भगवान के शयन करते समय उनके शरीर से एक दिव्य देवी का अविर्भाव हुआ, जो अपने तेज से दसों दिशाओं को आलोकित कर रही थी। उन्होंने मुरासुर को ललकारा। दोनों के बीच घोर युद्ध हुआ और अंततः उस दिव्य शक्ति ने केवल एक सिंहनाद से मुरासुर का अंत कर दिया। भगवान विष्णु जागे और जब उन्होंने यह दृश्य देखा, तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए।
जब समस्त देवता और स्वयं भगवान भी युद्ध से थककर विश्राम में थे,
तब उनकी ही शक्ति जागी और उसने वह कार्य किया जो कोई न कर सका।
भगवान विष्णु ने उस दिव्य देवी से पूछा, “हे देवि, तुम कौन हो और इतने बल से तुमने यह असुर कैसे नष्ट किया?” देवी ने कहा, “प्रभु, मैं आपकी ही शक्ति से उत्पन्न हुई हूँ।” भगवान ने प्रसन्न होकर कहा, “आज एकादशी तिथि है और तुम इसी तिथि को प्रकट हुई हो, इसलिए तुम्हारा नाम एकादशी होगा। मैं तुम्हें वरदान देता हूँ कि जो भी मनुष्य इस तिथि को व्रत रखेगा, वह समस्त पापों से मुक्त होगा और मेरे धाम वैकुण्ठ को प्राप्त होगा।” तभी से यह तिथि उत्पन्ना एकादशी के नाम से जगत में विख्यात हुई। इसी दिन से एकादशी व्रत की परंपरा आरंभ हुई और वर्ष की चौबीस एकादशियों का क्रम इसी तिथि से माना जाता है।
जो भक्त उत्पन्ना एकादशी को श्रद्धापूर्वक व्रत रखता है और यह कथा सुनता या पढ़ता है,
उसे सौ अश्वमेध यज्ञों का फल मिलता है और भगवान विष्णु के वरदान से वह वैकुण्ठ धाम प्राप्त करता है।
उत्पन्ना एकादशी पर जपने योग्य मंत्र
विष्णु मंत्र:
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः
विष्णु गायत्री मंत्र:
ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्
नारायण मंत्र:
ॐ नमो नारायणाय
श्री विष्णु मंत्र:
ॐ विष्णवे नमः
कृष्णाय वासुदेवाय मंत्र:
ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।
प्रणतः क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः।।
शान्ताकारं मंत्र
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं ।
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम् ।
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ।।
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उत्पन्ना एकादशी व्रत: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
उत्पन्ना एकादशी 2026 में कब है?
उत्पन्ना एकादशी शुक्रवार, 4 दिसंबर 2026 को है। एकादशी तिथि 3 दिसंबर को रात्रि 11:03 बजे आरंभ होगी और 4 दिसंबर को रात्रि 11:44 बजे समाप्त होगी।
उत्पन्ना एकादशी का पारण कब करें?
पारण 5 दिसंबर 2026 को प्रातः 6:58 बजे से 9:05 बजे के मध्य करें। पारण से पूर्व भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए तुलसी दल युक्त जल या फल ग्रहण करें, उसके बाद सात्विक भोजन करें।
उत्पन्ना एकादशी किस मास में आती है?
उत्पन्ना एकादशी मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को पड़ती है। भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में मार्गशीर्ष को अपना प्रिय मास बताया है, जो इस एकादशी को और भी अधिक पवित्र बनाता है।
उत्पन्ना एकादशी पर कौन से मंत्र जपें?
इस दिन ॐ नमो भगवते वासुदेवाय और ॐ नमो नारायणाय मंत्र का 108 बार जप करें। विष्णु सहस्रनाम का पाठ भी इस दिन विशेष फल देता है।
उत्पन्ना एकादशी का महत्व अन्य एकादशियों से अधिक क्यों है?
उत्पन्ना एकादशी को समस्त एकादशियों की जननी माना गया है। इस एकादशी का व्रत करने से वर्षभर की सभी चौबीस एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है और एकादशी देवी स्वयं व्रती को मोक्ष प्रदान करती हैं।
दशमी के दिन क्या खाना चाहिए और क्या नहीं?
दशमी (3 दिसंबर) को सूर्यास्त से पहले एक बार सात्विक और हल्का भोजन करें। चावल, उड़द दाल, प्याज, लहसुन और तामसिक भोजन वर्जित है। यही अंतिम भोजन होगा, इसलिए पौष्टिक पर सुपाच्य चुनें।
उत्पन्ना एकादशी पर क्या दान करें?
इस दिन ब्राह्मण को अन्न, वस्त्र, तिल और दक्षिणा का दान करना शुभ है। दिसंबर की शीत ऋतु में गर्म वस्त्र और भोजन का दान जरूरतमंदों को करने से व्रत का पुण्य और अधिक बढ़ता है।
हरि वासर क्या है और पारण से पहले इसकी प्रतीक्षा क्यों करें?
हरि वासर द्वादशी तिथि का प्रथम एक चौथाई समय होता है। शास्त्रों के अनुसार इस काल में व्रत तोड़ना अशुभ माना जाता है। 5 दिसंबर को हरि वासर समाप्ति के पश्चात प्रातः 6:58 बजे से पारण करें।
क्या रात्रि जागरण करना जरूरी है?
रात्रि जागरण अनिवार्य नहीं, किंतु बहुत फलदायी है। यदि पूर्ण जागरण संभव न हो तो कुछ समय विष्णु सहस्रनाम, भजन या हरे कृष्ण महामंत्र के जप में लगाएं। मन की शुद्धता और श्रद्धा जागरण से अधिक महत्वपूर्ण है।
क्या उत्पन्ना एकादशी से नया व्रत आरंभ किया जा सकता है?
हाँ, शास्त्रों में उत्पन्ना एकादशी को वार्षिक एकादशी व्रत-क्रम का आरंभ करने की सबसे शुभ तिथि बताया गया है। जो भक्त पहली बार एकादशी व्रत का संकल्प लेना चाहते हैं, वे इसी दिन से संकल्प लें, क्योंकि यह एकादशी देवी का प्राकट्य दिवस है।
हरि अनंत, हरि कथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुविधि सब संता॥


