मोक्षदा एकादशी 2026: 20 दिसंबर व्रत तिथि, पारण समय, पूजा विधि और व्रत कथा
Mokshada Ekadashi Vrat Date 2026: मोक्षदा एकादशी 20 दिसंबर 2026
मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को मोक्षदा एकादशी कहते हैं। वर्ष की चौबीस एकादशियों में यह तिथि मोक्ष की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को भगवद्गीता का ज्ञान दिया था, इसलिए यह गीता जयंती भी है। गीता में स्वयं श्रीकृष्ण ने कहा है, “मासानां मार्गशीर्षोऽहम्” यानी मासों में मार्गशीर्ष मैं हूँ। इसी कारण इस माह की एकादशी का पुण्य असाधारण है। पद्म पुराण के अनुसार यह व्रत स्वयं व्रती के साथ पितरों को भी मुक्ति दिलाता है। दक्षिण भारत की वैष्णव परंपरा में इसे वैकुण्ठ एकादशी कहते हैं, जिस दिन मंदिरों में वैकुण्ठ द्वार के दर्शन होते हैं।
मोक्षदा एकादशी 2026: 20 दिसंबर, रविवार | एकादशी तिथि: 19 दिसंबर रात्रि 10:09 बजे से 20 दिसंबर रात्रि 8:14 बजे तक | पारण: 21 दिसंबर प्रातः 7:07 से 9:14 बजे | मार्गशीर्ष माह, शुक्ल पक्ष | अन्य नाम: वैकुण्ठ एकादशी, गीता जयंती

इस वर्ष मोक्षदा एकादशी रविवार, 20 दिसंबर 2026 को मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष में पड़ रही है। एकादशी तिथि 19 दिसंबर को रात्रि 10:09 बजे से आरंभ होकर 20 दिसंबर को रात्रि 8:14 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के अनुसार व्रत 20 दिसंबर को ही रखा जाएगा। पारण 21 दिसंबर को प्रातः 7:07 से 9:14 बजे के बीच करें। हरि वासर 21 दिसंबर को रात्रि 1:35 बजे समाप्त होता है, उसके पश्चात ही प्रातःकाल पारण संभव है। भारत के अलग-अलग स्थानों में सूर्योदय का समय भिन्न हो सकता है, इसलिए सटीक पारण समय के लिए स्थानीय पंचांग अवश्य देखें। आइए जानते हैं मोक्षदा एकादशी का महत्व, पूजा विधि और व्रत कथा।
मोक्षदा एकादशी का महत्व जाने
मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की मोक्षदा एकादशी भगवान विष्णु की उन तिथियों में से है जो स्वयं और पितरों दोनों को मुक्ति प्रदान करती है। पद्म पुराण में श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया कि इस एकादशी की महिमा सुनने मात्र से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है।
यह तिथि गीता जयंती भी है, क्योंकि इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को भगवद्गीता का अमर ज्ञान दिया था। पद्म पुराण में इस एकादशी को ‘मोक्षदा’ कहा गया है क्योंकि यह घोर पापों को भी नष्ट कर देती है और भक्त को मोक्ष का मार्ग दिखाती है। इस दिन दशमी का भी अंश मिला होने से इसे मोक्षा एकादशी भी कहते हैं। पुराण में यह भी वर्णित है कि इस व्रत का पुण्य पितरों को अर्पित करने से वे नरक से मुक्त होकर स्वर्गलोक को प्राप्त होते हैं। जो व्यक्ति अपने पितरों के लिए चिंतित हो, उनके उद्धार का इससे श्रेष्ठ उपाय और कोई नहीं है। पद्म पुराण में श्रीकृष्ण का वचन है कि मोक्षदा एकादशी के समान मोक्ष देने वाली कोई दूसरी एकादशी नहीं है और इसके धार्मिक पुण्य का माप स्वयं ब्रह्मा भी नहीं जानते। यह व्रत कामधेनु और कल्पवृक्ष के समान है जो बिना माँगे ही अभीष्ट फल देता है। इस दिन भगवान दामोदर की तुलसी अंकुर से पूजा करना विशेष फलदायी है।
Mokshada Ekadashi Vrat Puja Vidhi: मोक्षदा एकादशी व्रत की पूजा विधि
- दशमी तिथि, 19 दिसंबर को सूर्यास्त से पहले एक बार सात्विक भोजन करें। चावल, उड़द दाल, प्याज, लहसुन और तामसिक पदार्थ इस दिन से वर्जित हैं। दशमी से ही शरीर और मन दोनों को व्रत के अनुकूल बनाना आवश्यक है।
- दशमी की रात पितरों का मन में स्मरण करें और यह संकल्प लें कि अगले दिन व्रत का पुण्य उन्हें समर्पित करेंगे। यही मोक्षदा एकादशी की वह विशेषता है जो इसे बाकी एकादशियों से अलग करती है।
- एकादशी के दिन ब्रह्ममुहूर्त में उठें, स्नान करके पीले वस्त्र धारण करें और पूजा स्थान को गंगाजल से पवित्र करें। भगवान विष्णु या शालिग्राम की प्रतिमा के सामने व्रत का संकल्प लें।
- संकल्प लेते समय कहें: “हे माधव, मोक्षदा एकादशी के इस व्रत का पुण्य मैं अपने और अपने पितरों की मुक्ति के लिए आपके चरणों में समर्पित करता हूँ।” जल भूमि पर छोड़ें।
- पूजन में तुलसी दल सबसे पहले अर्पित करें, फिर पीले पुष्प, चंदन, पंचामृत, धूप और घी का दीपक चढ़ाएं। तुलसी के बिना विष्णु पूजन अपूर्ण रहता है।
- गीता जयंती होने के कारण आज श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ अवश्य करें। कम से कम पंद्रहवाँ अध्याय पुरुषोत्तम योग का पाठ करना विशेष फलदायी है।
- ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का 108 बार जप करें। इस दिन विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने से मोक्षदा एकादशी का पुण्य कई गुना बढ़ जाता है।
- मोक्षदा एकादशी की व्रत कथा का श्रवण या पाठ अवश्य करें। पद्म पुराण में श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है कि इस कथा को सुनने मात्र से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है।
- तिल-जल से पितरों का तर्पण करें और उनके नाम व्रत का पुण्य अर्पित करें। राजा वैखानस ने यही किया था और उनके पिता नरक से मुक्त हो गए थे।
- रात्रि जागरण में भगवान विष्णु के भजन-कीर्तन करें। दक्षिण भारत की परंपरा में इस रात वैकुण्ठ द्वार दर्शन का विशेष पुण्य है। पूर्ण जागरण संभव न हो तो कुछ समय गीता पाठ में लगाएं।
- पारण 21 दिसंबर को प्रातः 7:07 से 9:14 बजे के बीच करें। हरि वासर 21 दिसंबर को रात्रि 1:35 बजे समाप्त होता है, उसके बाद सूर्योदय पर तुलसी दल युक्त जल से व्रत तोड़ें और सात्विक भोजन ग्रहण करें।
Mokshada Ekadashi Vrat Katha: मोक्षदा एकादशी की व्रत कथा

पद्म पुराण में श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को यह प्राचीन कथा सुनाई। चम्पक नगरी में वैखानस नाम के एक धर्मपरायण राजा राज्य करते थे। उनके राज्य में विष्णुभक्त ब्राह्मण और प्रसन्न प्रजा रहती थी। राजा अपनी प्रजा को पुत्रों के समान देखते और राज्य में सुख-समृद्धि का अभाव न था। किंतु एक रात राजा को एक ऐसा स्वप्न आया जिसने उनकी नींद उड़ा दी। उन्होंने देखा कि उनके पितर नरक में हैं और कह रहे हैं, “हे पुत्र, इस नरक के सागर से हमें मुक्त कराओ।” राजा जागे तो मन अत्यंत व्याकुल था। बड़े से बड़े राजवैभव ने उन्हें प्रसन्न नहीं किया। घोड़े, हाथी, राज्य, पत्नी और पुत्र, कुछ भी उनके मन को शांत नहीं कर सका।
राजा ने ब्राह्मणों को सब बताया। ब्राह्मणों ने कहा, “निकट ही महर्षि पर्वत का आश्रम है जो भूत-भविष्य सब जानते हैं। वहाँ जाइए।” राजा ब्राह्मणों और अन्य राजाओं के साथ महर्षि पर्वत के विशाल आश्रम पहुँचे। महर्षि ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के ज्ञाता ऋषियों से घिरे बैठे थे, स्वयं ब्रह्मा के समान तेजस्वी। राजा ने दंड की तरह भूमि पर लेटकर प्रणाम किया और चरण स्पर्श किए। राज्य के सात अंगों की कुशलता पूछने के बाद महर्षि ने आगमन का कारण जाना। राजा ने स्वप्न की पूरी बात सुनाई और पूछा, “किस व्रत के पुण्य से मेरे पितरों को मुक्ति मिलेगी?” महर्षि पर्वत ने ध्यान लगाया और पूर्वजन्म का ज्ञान प्राप्त कर बोले, “हे राजन, तुम्हारे पिता एक अभिमानी क्षत्रिय थे। एक बार वे अपनी पत्नी को उचित समय में उसका हक न देकर दूसरे गाँव चले गए। उस पाप के कारण वे नरक में गए।” राजा ने पूछा, “अब उपाय क्या है?” महर्षि ने कहा, “मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष में मोक्षदा एकादशी का व्रत करो और उसका समस्त पुण्य अपने पिता को अर्पित करो। उस पुण्य से उन्हें मुक्ति मिलेगी। यह ब्रह्मा का वचन है, इसमें कोई संदेह नहीं।”
जो पुण्य स्वयं के लिए किया जाए वह एक जन्म तक रहता है,
पर जो पुण्य पितरों को समर्पित किया जाए वह उन्हें नरक से भी निकाल लाता है।
राजा वैखानस घर लौटे और मार्गशीर्ष आते ही पूरे परिश्रम के साथ मोक्षदा एकादशी का व्रत किया। व्रत के पश्चात अपना समस्त पुण्य पिता को समर्पित किया। जैसे ही पुण्य अर्पण हुआ, आकाश से पुष्पवर्षा होने लगी। राजा के पिता पितरों सहित मुक्त हो गए। आकाश से पिता का स्वर आया, “हे पुत्र, तुम्हारा कल्याण हो।” इतना कहकर वे स्वर्ग को प्रस्थान कर गए। श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को कहा, “जो मोक्षदा एकादशी का व्रत करता है उसके पाप नष्ट होते हैं और मृत्यु के बाद मोक्ष मिलता है। इससे श्रेष्ठ मोक्ष देने वाली कोई एकादशी नहीं है और इसे पढ़ने या सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है।”
जो भक्त मोक्षदा एकादशी को श्रद्धापूर्वक व्रत रखता है, पुण्य पितरों को अर्पित करता है और यह कथा सुनता या पढ़ता है,
उसके पितर नरक से मुक्त होकर स्वर्ग को प्राप्त होते हैं और वह स्वयं भी मोक्ष का अधिकारी बनता है।
मोक्षदा एकादशी पर जपने योग्य मंत्र
विष्णु मंत्र:
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः
विष्णु गायत्री मंत्र:
ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्
नारायण मंत्र:
ॐ नमो नारायणाय
श्री विष्णु मंत्र:
ॐ विष्णवे नमः
कृष्णाय वासुदेवाय मंत्र:
ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।
प्रणतः क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः।।
शान्ताकारं मंत्र
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं ।
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम् ।
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ।।
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मोक्षदा एकादशी व्रत: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
मोक्षदा एकादशी 2026 में कब है?
मोक्षदा एकादशी रविवार, 20 दिसंबर 2026 को है। एकादशी तिथि 19 दिसंबर को रात्रि 10:09 बजे आरंभ होगी और 20 दिसंबर को रात्रि 8:14 बजे समाप्त होगी।
मोक्षदा एकादशी का पारण कब करें?
पारण 21 दिसंबर 2026 को प्रातः 7:07 बजे से 9:14 बजे के मध्य करें। हरि वासर 21 दिसंबर को रात्रि 1:35 बजे समाप्त होगा, उसके पश्चात ही प्रातःकाल पारण करें।
गीता जयंती और मोक्षदा एकादशी एक ही दिन क्यों है?
मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को ही भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्धभूमि में अर्जुन को भगवद्गीता का उपदेश दिया था। पद्म पुराण में महर्षि पर्वत ने राजा वैखानस को भी यही बताया था। इसीलिए यह तिथि गीता जयंती के रूप में मनाई जाती है।
मोक्षदा एकादशी को वैकुंठ एकादशी क्यों कहते हैं?
दक्षिण भारत की वैष्णव परंपरा में इसे वैकुंठ एकादशी कहते हैं। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु के वैकुंठ द्वार खुलते हैं और जो भक्त व्रत रखकर वैकुंठ द्वार दर्शन करता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
क्या मोक्षदा एकादशी पर पितरों के लिए तर्पण कर सकते हैं?
हाँ, यह इस एकादशी की सबसे बड़ी विशेषता है। पद्म पुराण की कथा में राजा वैखानस ने व्रत का पुण्य अपने पिता को अर्पित किया और उनके पिता को नरक से मुक्ति मिली। तिल-जल से तर्पण करके पितरों के नाम पुण्य समर्पित करना इस व्रत का अभिन्न अंग है।
मोक्षदा एकादशी पर कौन से मंत्र जपें?
इस दिन ॐ नमो भगवते वासुदेवाय और ॐ नमो नारायणाय मंत्र का 108 बार जप करें। भगवद्गीता के 15वें अध्याय का पाठ और विष्णु सहस्रनाम का पाठ इस दिन विशेष फल देता है।
दशमी के दिन क्या खाना चाहिए और क्या नहीं?
दशमी (19 दिसंबर) को सूर्यास्त से पहले एक बार सात्विक और हल्का भोजन करें। चावल, उड़द दाल, प्याज, लहसुन और तामसिक भोजन वर्जित है। यही अंतिम भोजन होगा, इसलिए पौष्टिक पर सुपाच्य चुनें।
हरि वासर क्या है और पारण से पहले इसकी प्रतीक्षा क्यों करें?
हरि वासर द्वादशी तिथि का प्रथम एक चौथाई समय होता है। शास्त्रों के अनुसार इस काल में व्रत तोड़ना अशुभ माना जाता है। 21 दिसंबर को हरि वासर रात्रि 1:35 बजे समाप्त होगा, उसके पश्चात प्रातः 7:07 बजे से पारण करें।
क्या रात्रि जागरण करना जरूरी है?
रात्रि जागरण अनिवार्य नहीं, किंतु बहुत फलदायी है। यदि पूर्ण जागरण संभव न हो तो कुछ समय विष्णु सहस्रनाम, भजन या भगवद्गीता पाठ में अवश्य लगाएं। मन की शुद्धता और श्रद्धा जागरण से अधिक महत्वपूर्ण है।
मोक्षदा एकादशी किस मास में आती है?
मोक्षदा एकादशी मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पड़ती है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में स्वयं कहा है कि मासों में मार्गशीर्ष श्रेष्ठ है। इसीलिए इस माह की यह एकादशी असाधारण पुण्यदायी मानी गई है।
मोक्षदा एकादशी का महत्व क्या है?
पद्म पुराण के अनुसार मोक्षदा एकादशी व्रत का पुण्य स्वयं व्रती के साथ-साथ पितरों को भी मुक्ति दिलाता है। श्रीकृष्ण ने कहा कि इसके समान मोक्ष देने वाली कोई दूसरी एकादशी नहीं है और इसका पुण्य स्वयं ब्रह्मा भी नहीं माप सकते।
एकादशी के दिन क्या खाएं और क्या न खाएं?
एकादशी के दिन अन्न, चावल, दाल और तामसिक भोजन वर्जित है। फलाहार में साबूदाना, कुट्टू, सेंधा नमक, आलू, फल और दूध ले सकते हैं। निर्जला व्रत सर्वोत्तम माना जाता है, पर फलाहार रखने वालों को भी व्रत का पुण्य मिलता है।
क्या गीता दान करने का विधान है?
हाँ, गीता जयंती पर गीता ग्रंथ का दान महादान माना गया है। शास्त्रों में ग्रंथदान को सर्वश्रेष्ठ दान कहा गया है। इस दिन किसी जरूरतमंद को गीता भेंट करना और उन्हें इस ज्ञान से जोड़ना व्रत के पुण्य को और बढ़ाता है।
हरि अनंत, हरि कथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुविधि सब संता॥


