🙏 ॥ जय गणेशाय नमः ॥ 🙏

राम नवमी व्रत 2026 - सही तिथि, पूजा विधि, व्रत नियम, कथा और आरती

राम नवमी व्रत कब है? 26 या 27 मार्च?

साल 2026 में राम नवमी की तिथि को लेकर लोगों के मन में अक्सर भ्रम रहता है कि यह पर्व 26 मार्च को मनाया जाए या 27 मार्च को। चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि 26 मार्च को दिन के समय प्रारंभ होकर 27 मार्च की सुबह तक रहती है। हिंदू परंपरा में अधिकांश व्रत और त्योहार उदया तिथि (सूर्योदय के समय जो तिथि हो) के अनुसार मनाए जाते हैं। इस नियम के अनुसार 27 मार्च 2026 को राम नवमी मनाना अधिक उपयुक्त माना जाता है।

वहीं दूसरी ओर, धार्मिक मान्यता यह भी है कि भगवान श्रीराम का जन्म मध्याह्न काल (दोपहर के समय) में हुआ था। चूंकि 26 मार्च को दोपहर के समय नवमी तिथि विद्यमान रहेगी, इसलिए कई श्रद्धालु इसी दिन राम जन्मोत्सव मनाते हैं और व्रत भी रखते हैं। इस प्रकार, दोनों ही तिथियों का अपना-अपना महत्व है, और श्रद्धालु अपनी परंपरा एवं मान्यता के अनुसार राम नवमी का व्रत और पूजा कर सकते हैं।

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राम नवमी व्रत पूजा विधि

  • सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ, हल्के रंग (पीला, सफेद या केसरिया) के वस्त्र धारण करें।

  • पूजा स्थान को साफ करके गंगाजल छिड़कें और एक चौकी पर स्वच्छ कपड़ा बिछाएं।

  • सबसे पहले भगवान गणेश की पूजा करें, जिससे पूजा निर्विघ्न पूरी हो।

    • गणेश जी को फूल और अक्षत अर्पित करें
    • मंत्र: ॐ गणेशाय नमः
  • अब चौकी पर भगवान श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण जी और हनुमान जी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।

  • दीपक और धूप जलाकर वातावरण को पवित्र बनाएं।

  • हाथ में जल और अक्षत लेकर व्रत एवं पूजा का संकल्प लें।

    • मंत्र: ॐ श्री रामाय नमः
  • राम नवमी व्रत का पालन करें:

    • सूर्योदय से पूजा पूर्ण होने तक व्रत रखें
    • फल, दूध या हल्का सात्विक आहार लें
    • अपनी क्षमता अनुसार निर्जल या फलाहार व्रत भी रखा जा सकता है
  • भगवान श्रीराम का पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से अभिषेक करें।

  • चंदन का तिलक लगाकर पुष्प, माला और तुलसी दल अर्पित करें।

  • भोग के रूप में खीर, पंजीरी, फल या मिठाई अर्पित करें।

  • मध्याह्न काल में भगवान श्रीराम के जन्म का स्मरण करते हुए विशेष पूजा करें।

  • पूजा के दौरान इन मंत्रों का जाप करें:

    • ॐ श्री रामाय नमः
    • श्री रामचन्द्राय नमः
    • श्री राम जय राम जय जय राम
  • रामचरितमानस, राम रक्षा स्तोत्र या सुंदरकांड का पाठ करना शुभ माना जाता है।

  • अंत में धूप, दीप और कपूर के साथ श्री राम जी की आरती करें (नीचे दी गई आरती पढ़ें)।

  • प्रसाद सभी में वितरित करें और व्रत रखने वाले श्रद्धालु पूजा के बाद विधिपूर्वक पारण करें।


श्री राम आरती ( Shri Ram Aarti)

श्री राम चंद्र कृपालु भजमन हरण भव भय दारुणम्।
नवकंज लोचन कंज मुखकर, कंज पद कन्जारुणम्।।

कंदर्प अगणित अमित छवी नव नील नीरज सुन्दरम्।
पट्पीत मानहु तडित रूचि शुचि नौमी जनक सुतावरम्।।

भजु दीन बंधु दिनेश दानव दैत्य वंश निकंदनम्।
रघुनंद आनंद कंद कौशल चंद दशरथ नन्दनम्।।

सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदारू अंग विभूषणं।
आजानु भुज शर चाप धर संग्राम जित खर-धूषणं।।

इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रंजनम्।
मम ह्रदय कुंज निवास कुरु कामादी खल दल गंजनम्।।

मनु जाहिं राचेऊ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर सावरों।
करुना निधान सुजान सिलू सनेहू जानत रावरो।।

एही भांती गौरी असीस सुनी सिय सहित हिय हरषी अली।
तुलसी भवानी पूजि पूनी पूनी मुदित मन मंदिर चली।।

दोहा- जानि गौरी अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।
मंजुल मंगल मूल वाम अंग फरकन लगे।।


राम नवमी व्रत कथा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, अयोध्या के राजा दशरथ के जीवन में सबसे बड़ी चिंता यह थी कि उनके कोई संतान नहीं थी। राज्य समृद्ध था, प्रजा सुखी थी, लेकिन उत्तराधिकारी के अभाव में राजा और रानियां अत्यंत चिंतित रहते थे। तब गुरु महर्षि वशिष्ठ ने उन्हें विशेष यज्ञ करने की सलाह दी, जिससे पुत्र प्राप्ति का योग बन सके। गुरु की आज्ञा मानकर राजा दशरथ ने विधिपूर्वक एक महान यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में अनेक विद्वान ऋषि-मुनि और तपस्वी सम्मिलित हुए। यज्ञ पूरा होने के बाद अग्नि से दिव्य प्रसाद प्रकट हुआ, जिसे राजा दशरथ ने अपनी तीनों रानियों - कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा में बांट दिया।

समय आने पर तीनों रानियों ने गर्भ धारण किया और शुभ मुहूर्त में संतानों को जन्म दिया। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि के मध्याह्न समय माता कौशल्या ने एक दिव्य तेज से युक्त बालक को जन्म दिया, जिन्हें भगवान विष्णु का अवतार श्रीराम माना गया। इसके बाद कैकेयी के पुत्र भरत और सुमित्रा के दो पुत्र लक्ष्मण एवं शत्रुघ्न का जन्म हुआ। चारों राजकुमारों के जन्म से अयोध्या नगरी में हर्ष और उत्सव का वातावरण छा गया। कहा जाता है कि देवताओं ने भी आकाश से पुष्प वर्षा कर इस शुभ अवसर का स्वागत किया। महर्षि वशिष्ठ द्वारा सभी बालकों का नामकरण किया गया और उनमें सबसे ज्येष्ठ का नाम “राम” रखा गया।

भगवान श्रीराम को मर्यादा, धर्म और आदर्श जीवन का प्रतीक माना जाता है। उन्होंने अपने जीवन में सदैव सत्य और कर्तव्य का पालन किया। यही कारण है कि उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम बुलाया जाता है। उनके जन्म दिवस को राम नवमी के रूप में मनाया जाता है और भक्त इस दिन व्रत रखकर भगवान श्रीराम की पूजा करते हैं। इस व्रत कथा को श्रद्धा से सुनने या पढ़ने से जीवन में सकारात्मकता, शांति और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्राप्त होती है।


भगवान राम के अवतार की कथा

त्रेता युग में लंका का राजा रावण अत्यंत शक्तिशाली और विद्वान था। उसने कठोर तपस्या करके ब्रह्मा जी से ऐसा वरदान प्राप्त किया था कि देवता, दानव और अन्य दिव्य शक्तियाँ उसे पराजित नहीं कर सकती थीं। इस वरदान के कारण रावण अत्यधिक अहंकारी हो गया और उसने अपनी शक्ति का दुरुपयोग करना शुरू कर दिया। वह ऋषि-मुनियों के यज्ञों को भंग करता, देवताओं को परास्त करता और धर्म के मार्ग में बाधा उत्पन्न करता था। पृथ्वी पर अधर्म और भय का वातावरण फैल गया था। तब सभी देवता एकत्र होकर भगवान विष्णु के पास गए और उनसे प्रार्थना की कि वे इस संकट से मुक्ति दिलाएं। देवताओं की विनती सुनकर भगवान विष्णु ने आश्वासन दिया कि वे मानव रूप में जन्म लेकर रावण के अत्याचारों का अंत करेंगे।

कहा जाता है कि रावण ने अपने वरदान में मनुष्य और वानर को महत्व नहीं दिया था, क्योंकि वह उन्हें तुच्छ समझता था। यही कारण बना कि भगवान विष्णु ने मानव रूप में श्रीराम के रूप में अवतार लेने का निश्चय किया। इसके बाद अयोध्या के राजा दशरथ के यहां यज्ञ के माध्यम से भगवान श्रीराम का जन्म हुआ। यही दिव्य अवतार आगे चलकर रावण के विनाश और धर्म की स्थापना का कारण बना।

इस कथा से यह संदेश मिलता है कि जब-जब अधर्म बढ़ता है, तब-तब भगवान किसी न किसी रूप में अवतार लेकर धर्म की रक्षा करते हैं। राम नवमी उसी दिव्य घटना का उत्सव है, जो सत्य, मर्यादा और धर्म की विजय का प्रतीक है।


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