आरती कुंजबिहारी की | सम्पूर्ण लिरिक्स हिंदी में अर्थ सहित | श्री कृष्ण आरती

आरती कुंजबिहारी की भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित एक अत्यंत लोकप्रिय आरती है जिसे कवि श्री जगन्नाथदास रत्नाकर ने लिखा था। यह आरती भगवान श्रीकृष्ण के श्रृंगार का एक सजीव चित्र है। उनके गले की वैजयंती माला, मोर मुकुट, मुरली की मिठास और राधिका के संग की छटा इन शब्दों में इस प्रकार उतरी है कि गाते-गाते मन वृंदावन पहुँच जाता है। जन्माष्टमी हो या संध्या की नित्य आरती, यह पाठ किए बिना पूजन अधूरा लगता है।
आरती कुंजबिहारी की (श्री कृष्ण आरती)
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ।
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ।।
गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला ।
श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला ।
गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली ।
लतन में ठाढ़े बनमाली,
भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक,
ललित छवि श्यामा प्यारी की ।।
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ।
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ।।
कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं ।
गगन सों सुमन रासि बरसै,
बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग,
अतुल रति गोप कुमारी की ।।
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ।
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ।।
जहां ते प्रकट भई गंगा, कलुष कलि हारिणि श्रीगंगा ।
स्मरन ते होत मोह भंगा,
बसी सिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच,
चरन छवि श्रीबनवारी की ।।
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ।
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ।।
चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू ।
चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू,
हंसत मृदु मंद, चांदनी चंद, कटत भव फंद,
टेर सुन दीन भिखारी की ।।
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ।
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ।।
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ।।
॥ श्री कृष्ण आरती सम्पूर्ण ॥
आरती कुंजबिहारी की: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
आरती कुंजबिहारी की किसने लिखी?
आरती कुंजबिहारी की की रचना हिंदी के प्रसिद्ध कवि श्री जगन्नाथदास रत्नाकर ने की थी। वे भगवान कृष्ण के परम भक्त थे और उनकी रचनाएं वृंदावन की भक्ति परंपरा में गहरी पैठ रखती हैं।
आरती कुंजबिहारी की कब गानी चाहिए?
यह आरती संध्याकालीन पूजा में, जन्माष्टमी के निशीथ काल में और भजन-कीर्तन के समापन पर विशेष रूप से गाई जाती है। नित्य पूजन में सूर्यास्त के बाद इस आरती का गायन अत्यंत शुभ माना जाता है।
‘कुंजबिहारी’ का क्या अर्थ है?
कुंजबिहारी का अर्थ है जो कुंजों अर्थात लता-वृक्षों के झुरमुट में विहार करते हैं। यह भगवान श्रीकृष्ण का एक प्रिय नाम है जो वृंदावन की उनकी लीलाओं से जुड़ा है।
‘गिरिधर’ और ‘कृष्णमुरारी’ के क्या अर्थ हैं?
गिरिधर का अर्थ है गोवर्धन पर्वत को उठाने वाले। कृष्णमुरारी में मुरारी का अर्थ है मुर नामक असुर को मारने वाले। दोनों नाम भगवान श्रीकृष्ण की शक्ति और उनकी लीलाओं का वर्णन करते हैं।
इस आरती में ‘वैजयंती माला’ का उल्लेख क्यों है?
वैजयंती माला पाँच प्रकार के पुष्पों से बनी एक दिव्य माला है जो भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण का प्रिय आभूषण है। शास्त्रों में इसे विजय और ऐश्वर्य का प्रतीक माना गया है।
‘गगन सम अंग कांति काली’ का क्या भाव है?
इस पंक्ति का भाव है कि भगवान कृष्ण का शरीर आकाश जैसा गहरा नीला-सांवला है। यह रंग मेघश्याम कहलाता है और यही उनकी सबसे प्रिय छवि है जो भक्तों के मन को मोह लेती है।
क्या यह आरती जन्माष्टमी के लिए विशेष है?
हाँ, जन्माष्टमी के निशीथ काल में जब भगवान कृष्ण का जन्म मनाया जाता है, तब यह आरती विशेष रूप से गाई जाती है। पर यह केवल जन्माष्टमी तक सीमित नहीं, संध्या पूजन में नित्य गाने योग्य है।
इस आरती में गंगा का उल्लेख क्यों किया गया है?
तीसरे अंतरे में कहा गया है कि गंगा भगवान विष्णु के चरणों से प्रकट हुई हैं और शिव के सिर पर विराजमान हैं। यह श्रीकृष्ण के चरणों की महिमा बताने का काव्यात्मक तरीका है।
आरती में ‘दीन भिखारी’ किसे कहा गया है?
अंतिम अंतरे में भक्त स्वयं को दीन भिखारी कहकर भगवान की टेर लगाता है। यह नम्रता और समर्पण का भाव है जो भक्ति परंपरा में सर्वोच्च माना जाता है।
क्या इस आरती का पाठ घर पर किया जा सकता है?
बिल्कुल। यह आरती घर पर बाल गोपाल की प्रतिमा के सामने प्रतिदिन संध्याकाल में गाई जा सकती है। दीपक, धूप और तुलसी दल के साथ इस आरती का गायन घर में सकारात्मक ऊर्जा और कृष्ण की कृपा लाता है।
आरती कुंजबिहारी की को इंग्लिश में कैसे लिखते हैं?
रोमन लिपि में यह Aarti Kunj Bihari Ki, Shri Giridhar Krishna Murari Ki लिखी जाती है। यह जानना प्रवासी भक्तों और नई पीढ़ी के लिए उपयोगी है जो देवनागरी पढ़ने में सहज नहीं हैं।


