🙏 ॥ जय गणेशाय नमः ॥ 🙏

गुरु प्रदोष व्रत 2026 - 28 मई तिथि, प्रदोष काल, पूजा विधि और कथा

Guru Pradosh Vrat Date 2026: गुरु प्रदोष व्रत मई 2026 में कब है?

प्रदोष व्रत हर माह की त्रयोदशी तिथि को, शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्षों में, भगवान शिव की आराधना के लिए रखा जाता है। 28 मई 2026 का यह प्रदोष व्रत विशेष है, क्योंकि यह अधिक ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष त्रयोदशी को पड़ रहा है। अधिक मास, जिसे पुरुषोत्तम मास भी कहते हैं, हर तीन वर्ष में एक बार आता है। इस दुर्लभ मास में किया गया व्रत, पूजा और दान कई गुना फलदायी माना जाता है। गुरुवार के दिन पड़ने से इसे गुरु प्रदोष व्रत कहा जाता है।

गुरु प्रदोष व्रत 2026: 28 मई, गुरुवार | प्रदोष काल: सायं 07:12 बजे से रात्रि 09:15 बजे तक | त्रयोदशी: शुक्ल पक्ष, अधिक ज्येष्ठ मास

28 मई 2026 गुरु प्रदोष व्रत - शुक्ल पक्ष त्रयोदशी, अधिक ज्येष्ठ मास

त्रयोदशी तिथि का आरंभ 28 मई को प्रातः 07:56 बजे होगा और समाप्ति 29 मई को प्रातः 09:50 बजे। उदया तिथि के नियम अनुसार व्रत 28 मई, गुरुवार को ही रखा जाएगा। प्रदोष पूजा का शुभ समय सायं 07:12 बजे से रात्रि 09:15 बजे तक है, जो करीब 2 घंटे 2 मिनट का है। पारण 29 मई को सूर्योदय के पश्चात, त्रयोदशी तिथि रहते हुए, किया जाएगा। आइए जानते हैं इस व्रत का महत्व, पूजा विधि और गुरु प्रदोष व्रत कथा

ध्यान रखें: प्रदोष काल स्थान के अनुसार बदलता है - यह सूर्यास्त के समय पर निर्भर करता है। भौगोलिक स्थिति के कारण भारत के अलग-अलग स्थानों में सूर्योदय और सूर्यास्त का समय अलग हो सकता है। इसलिए सटीक जानकारी के लिए अपने स्थानीय पंचांग या खगोलीय विवरण जरूर देखें।


गुरु प्रदोष व्रत का महत्व जाने

शिव भक्ति के अनेक मार्ग हैं, पर प्रदोष व्रत का स्थान उन सब में कुछ अलग ही है। जब त्रयोदशी तिथि गुरुवार को पड़ती है, तो इसे गुरु प्रदोष कहते हैं, और इस दिन का महत्व और भी गहरा हो जाता है।

शास्त्रों में कहा गया है कि प्रदोष काल में भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न मुद्रा में होते हैं। वे नंदी के दोनों सींगों के बीच नृत्य करते हैं, उनके साथ माता पार्वती, कार्तिकेय, गणेश और समस्त देवगण उपस्थित रहते हैं। इस दिव्य क्षण में जो भक्त सच्चे मन से शिव की आराधना करता है, उसके पाप नष्ट होते हैं, रोग और दुख दूर होते हैं, और मोक्ष का मार्ग खुलता है। गुरु प्रदोष पर बृहस्पति की कृपा भी साथ होती है, इसलिए इस दिन किया गया व्रत ज्ञान, संतान सुख और दांपत्य जीवन में शांति देने वाला कहा गया है। यह व्रत शत्रुओं पर विजय दिलाने में भी सहायक है। देवताओं ने भी वृत्रासुर जैसे महाबली दैत्य पर विजय पाने के लिए यही व्रत किया था। जो इसे श्रद्धा और विधि-विधान से करता है, उसके जीवन में बाधाएं दूर होती हैं और भगवान शिव की कृपा सदा बनी रहती है।


Guru Pradosh Vrat Puja Vidhi: गुरु प्रदोष व्रत की पूजा विधि

  • व्रत के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें, स्वच्छ वस्त्र धारण करें और हाथ में जल व अक्षत लेकर संकल्प लें कि आज का यह व्रत भगवान शिव की प्रसन्नता के लिए किया जा रहा है।
  • स्कंद पुराण के अनुसार प्रदोष व्रत दो प्रकार से रखा जाता है, पहला सूर्योदय से सूर्यास्त तक उपवास और दूसरा चौबीस घंटे का निर्जला व्रत जिसमें रात्रि जागरण भी सम्मिलित है।
  • व्रत के दिन गेहूं, चावल, दाल, प्याज, लहसुन और मांसाहार पूर्णतः वर्जित हैं। फल, दूध, दही, साबूदाना और सेंधा नमक से बनी सात्विक चीजें ग्रहण की जा सकती हैं।
  • सायंकाल सूर्यास्त से लगभग एक घंटे पहले पुनः स्नान करें, पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें और दर्भ घास पर कमल का चिह्न बनाकर तांबे या पीतल का कलश स्थापित करें।
  • कलश में जल भरकर उसके ऊपर आम के पत्ते और नारियल रखें, फिर भगवान गणेश, माता पार्वती, कार्तिकेय, नंदी और शिव परिवार का क्रमशः आवाहन करें।
  • शिवलिंग का पंचामृत से अभिषेक करें, जिसमें दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल का उपयोग हो। अभिषेक करते समय ॐ नमः शिवाय का जप करते रहें।
  • अभिषेक के बाद बिल्व पत्र, धतूरे के फूल, सफेद पुष्प, चंदन और विभूति अर्पित करें। नंदी की पूजा अवश्य करें क्योंकि शिव के द्वार पर नंदी की उपस्थिति अनिवार्य मानी गई है।
  • प्रदोष काल में प्रदोष स्तोत्रम का पाठ और महामृत्युंजय मंत्र का रुद्राक्ष माला पर 108 बार जप करें। इस समय किया गया जप दो अश्वमेध यज्ञ के फल के बराबर फलदायी बताया गया है।
  • गुरु प्रदोष व्रत कथा का श्रवण या पठन पूजा का अभिन्न अंग है, इसे कभी न छोड़ें। कथा के बाद आरती करें और प्रसाद परिजनों में बांटें।
  • व्रत के दिन क्रोध, कटु वचन, असत्य भाषण और व्यर्थ के वाद-विवाद से बचें। मन को शांत और एकाग्र रखें, यही व्रत का सबसे बड़ा नियम है।
  • पारण 29 मई को सूर्योदय के बाद करें। स्नान कर भगवान शिव को प्रणाम करें और इसके बाद सात्विक भोजन से व्रत खोलें।

Guru Pradosh Vrat Katha: गुरु प्रदोष व्रत की कथा

इंद्रदेव गुरु बृहस्पति के साथ शिव-पार्वती के सामने गुरु प्रदोष व्रत करते हुए - कथा दृश्य

पुराणों में वर्णित है कि एक समय देवताओं और वृत्रासुर के बीच भीषण युद्ध छिड़ गया। वृत्रासुर अत्यंत बलशाली था और देवसेना बार-बार परास्त हो रही थी। इंद्र सहित सभी देवता हताश हो उठे। तब इंद्रदेव अपने गुरु बृहस्पति के पास गए और उनसे इस संकट का उपाय पूछा।

॥ ॐ नमः शिवाय ॥

गुरु बृहस्पति ने दिव्य दृष्टि से वृत्रासुर के बल का कारण जाना। उन्होंने बताया कि यह असुर पूर्व जन्म में चित्ररथ नामक राजा था। एक बार वह विमान में सवार होकर कैलाश पर्वत के ऊपर से निकला। वहाँ उसने भगवान शिव को माता पार्वती के साथ विराजमान देखा और उनकी दिव्य लीला देखकर उपहास किया। इस दुस्साहस से कुपित होकर माता पार्वती ने उसे राक्षस योनि में जन्म लेने का श्राप दिया - उसी श्राप के फलस्वरूप वह वृत्रासुर बना।

वृत्रासुर ने शिव भक्ति में ब्रह्मचर्यपूर्वक तप किया था
इसीलिए उसे साधारण बल से जीतना संभव नहीं था।

गुरु बृहस्पति ने इंद्र को मार्ग दिखाया - गुरुवार की त्रयोदशी को जो प्रदोष व्रत पड़ता है, उसे गुरु प्रदोष कहते हैं। यदि इंद्र विधि-विधान से यह व्रत रखें, भगवान शिव की संध्या बेला में आराधना करें और सच्चे मन से क्षमा माँगें, तो महादेव की कृपा से शत्रु पर विजय अवश्य मिलेगी। इंद्र ने गुरुदेव के वचनों पर श्रद्धा रखी और गुरु प्रदोष व्रत का पूर्ण विधि से पालन किया।

॥ ॐ नमः शिवाय ॥

व्रत के प्रभाव से भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने इंद्र को अभय वरदान दिया। देवराज इंद्र ने पुनः युद्ध किया और इस बार वृत्रासुर पराजित हुआ। तीनों लोकों में फिर से देवताओं का वर्चस्व स्थापित हुआ।

इस कथा से स्पष्ट है - गुरु प्रदोष व्रत केवल व्यक्तिगत कष्टों को नहीं हरता।
यह शत्रुओं पर विजय, जीवन में दिशा और शिव-बृहस्पति दोनों की एकसाथ कृपा देने वाला व्रत है।


गुरु प्रदोष व्रत में जपे ये मंत्र

पंचाक्षरी मंत्र (सर्वसिद्धि के लिए) ॐ नमः शिवाय

हवन हेतु शिव मंत्र मंत्र - “ॐ हौं क्लीं नमः शिवाय स्वाहा” से आहुति देनी चाहिये।

महामृत्युंजय मंत्र (मोक्ष और आरोग्य के लिए)
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

ऋणमोचन मंत्र (कर्ज और आर्थिक बाधा से मुक्ति के लिए)
ॐ ऋणमुक्तेश्वर महादेवाय नमः

बृहस्पति बीज मंत्र (गुरु प्रदोष विशेष, बृहस्पति कृपा के लिए)
ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः

यह मंत्र गुरु प्रदोष पर विशेष फलदायी है। गुरुवार को शिव-पूजा के पश्चात इस मंत्र का 108 बार जाप करने से बृहस्पति ग्रह की शांति होती है और ज्ञान, विद्या तथा समृद्धि के मार्ग खुलते हैं।

शिव गायत्री मंत्र ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि।
तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥

पढ़ें - प्रदोष स्तोत्रम


गुरु प्रदोष व्रत: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

गुरु प्रदोष व्रत 2026 में कब है? गुरु प्रदोष व्रत 28 मई 2026, गुरुवार को है। यह अधिक ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष त्रयोदशी को पड़ रहा है। इस वर्ष यह व्रत पुरुषोत्तम मास में आने के कारण विशेष फलदायी है।

प्रदोष काल का समय क्या है? 28 मई 2026 को प्रदोष पूजा का शुभ समय सायं 07:12 बजे से रात्रि 09:15 बजे तक है, जो लगभग 2 घंटे 2 मिनट का है। ध्यान रखें कि प्रदोष काल स्थानीय सूर्यास्त के अनुसार बदलता है, इसलिए अपने शहर का पंचांग अवश्य देखें।

गुरु प्रदोष व्रत का पारण कब करें? पारण 29 मई 2026 को सूर्योदय के पश्चात किया जाएगा। त्रयोदशी तिथि 29 मई को प्रातः 09:50 बजे तक है, इसलिए उससे पहले स्नान कर भगवान शिव को प्रणाम करें और सात्विक भोजन से व्रत खोलें।

क्या गुरु प्रदोष व्रत में फलाहार किया जा सकता है? हाँ, फलाहार की अनुमति है। फल, दूध, दही, साबूदाना और सेंधा नमक से बनी सात्विक चीजें ग्रहण की जा सकती हैं। गेहूं, चावल, दाल, प्याज, लहसुन और मांसाहार पूर्णतः वर्जित हैं। जो सक्षम हों, वे निर्जला व्रत भी रख सकते हैं।

गुरु प्रदोष और सामान्य प्रदोष में क्या अंतर है? प्रदोष व्रत हर माह की त्रयोदशी को आता है, पर जब यह तिथि गुरुवार को पड़े तो इसे गुरु प्रदोष कहते हैं। इस दिन भगवान शिव की कृपा के साथ बृहस्पति की शक्ति भी जुड़ जाती है, जिससे ज्ञान, संतान सुख, दांपत्य शांति और शत्रु पर विजय के लिए यह व्रत अधिक प्रभावशाली माना जाता है।

क्या 2026 का गुरु प्रदोष व्रत अधिक मास में है? हाँ, 28 मई 2026 का गुरु प्रदोष व्रत अधिक ज्येष्ठ मास यानी पुरुषोत्तम मास में पड़ रहा है, जो 17 मई से 15 जून 2026 तक है। यह मास हर तीन वर्ष में एक बार आता है और इसमें किया गया हर धार्मिक कार्य कई गुना फलदायी होता है। गुरु प्रदोष का इस मास में पड़ना इसे वर्ष का सबसे दुर्लभ और शुभ प्रदोष बनाता है।

गुरु प्रदोष व्रत में कौन से मंत्र जपें? इस दिन पंचाक्षरी मंत्र ॐ नमः शिवाय, महामृत्युंजय मंत्र और बृहस्पति बीज मंत्र (ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः) का जप विशेष फलदायी है। विस्तृत जानकारी के लिए मंत्र सेक्शन देखें।


काल हर, कष्ट हर, दुख हर, दरिद्र हर, सर्व रोग हर, सर्व पाप हर, नमः पार्वती पतये, हर हर महादेव 🙏 🙏 🙏

twitter facebook telegram whatsapp