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अजा एकादशी 2026: 7 सितंबर व्रत तिथि, पारण समय, राजा हरिश्चंद्र व्रत कथा और पूजा विधि

Aja Ekadashi Vrat Date 2026: अजा एकादशी 7 सितंबर 2026 को कब है?

भाद्रपद मास का कृष्ण पक्ष पितृ तर्पण और आत्मशुद्धि के लिए विशेष महत्व रखता है। इसी पवित्र काल में पड़ने वाली अजा एकादशी को अन्नदा एकादशी और पापनाशिनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पद्म पुराण में इसे पितृ मोक्ष के लिए श्रेष्ठ बताया गया है।

अजा एकादशी 2026: 7 सितंबर, सोमवार | एकादशी तिथि: 6 सितंबर सायं 7:29 बजे से 7 सितंबर सायं 5:04 बजे तक | पारण: 8 सितंबर प्रातः 6:02 से 8:33 बजे | भाद्रपद माह, कृष्ण पक्ष

अजा एकादशी 2026 - भगवान विष्णु की पूजा

इस वर्ष अजा एकादशी सोमवार, 7 सितंबर 2026 को भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में पड़ रही है। एकादशी तिथि 6 सितंबर को सायं 7:29 बजे से आरंभ होकर 7 सितंबर को सायं 5:04 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के अनुसार व्रत 7 सितंबर को ही रखा जाएगा। पारण 8 सितंबर को प्रातः 6:02 से 8:33 बजे के बीच करें। भारत के अलग-अलग स्थानों में सूर्योदय का समय भिन्न हो सकता है, इसलिए सटीक पारण समय के लिए स्थानीय पंचांग अवश्य देखें। आइए जानते हैं अजा एकादशी का महत्व, पूजाविधि और व्रत कथा


अजा एकादशी का महत्व जाने

भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में जब यह एकादशी आती है, तो शास्त्र इसे दोनों लोकों के लिए सर्वश्रेष्ठ व्रत कहते हैं। पद्म पुराण में श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया कि इस एकादशी का नाम अजा है और यह समस्त पापों का नाश करती है, यहाँ तक कि इसकी कथा सुनने मात्र से भी पाप नष्ट हो जाते हैं।

अजा शब्द का अर्थ है अजन्मा या शाश्वत। यह नाम इस व्रत के उस गुण की ओर संकेत करता है जो जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति दिलाता है। पद्म पुराण में श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि इससे बड़ा कोई व्रत नहीं है जो दोनों लोकों का कल्याण करे। राजा हरिश्चंद्र जैसे महान सत्यनिष्ठ राजा, जो अपना राज्य, पत्नी, पुत्र और स्वयं को भी खो चुके थे और एक चांडाल के दास बनकर श्मशान में दिन बिता रहे थे, उन्हें भी इस एकादशी के व्रत ने सात दिनों में ही कर्म-पाश से मुक्त कर दिया। जो वर्षों की पीड़ा किसी तीर्थ या यज्ञ से न मिटी, वह एक एकादशी के व्रत और रात्रि जागरण से नष्ट हो गई। पद्म पुराण में कहा गया है कि जो इस व्रत का पाठ या श्रवण करता है, उसे अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। यह व्रत पाप-नाश, पुनर्मिलन और मोक्ष तीनों का द्वार एक साथ खोलता है।


Aja Ekadashi Vrat Puja Vidhi: अजा एकादशी व्रत की पूजा विधि

  • दशमी (6 सितंबर) की संध्या से पहले सात्विक और हल्का भोजन करें। चावल, उड़द दाल, प्याज, लहसुन और तामसिक भोजन पूरी तरह वर्जित हैं। यही अंतिम भोजन होगा, इसलिए पौष्टिक पर सुपाच्य चुनें।
  • दशमी की रात्रि मन को भगवान विष्णु के स्मरण में लगाएं। अगले दिन के संकल्प के लिए चित्त को शांत और विचारों को पवित्र रखें। अधिक जागरण से बचें ताकि एकादशी का व्रत शरीर पर भारी न पड़े।
  • एकादशी (7 सितंबर) को सूर्योदय से पहले स्नान करें, स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें और पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें। भगवान विष्णु या शालिग्राम की प्रतिमा के सामने बैठकर अजा एकादशी व्रत का संकल्प लें।
  • पूजा में तुलसी दल, पीले पुष्प, चंदन, पंचामृत, धूप और घी का दीपक अर्पित करें। तुलसी के बिना भगवान विष्णु की पूजा अधूरी मानी जाती है, इसलिए तुलसी दल का विशेष ध्यान रखें।
  • पितृ तर्पण का यह उचित समय है। भाद्रपद कृष्ण पक्ष में एकादशी पर पूर्वजों का स्मरण करते हुए जलाभिषेक करें और उनकी मुक्ति के लिए प्रार्थना करें। पितृ दोष से मुक्ति के लिए यह क्रम विशेष फल देता है।
  • मंत्र जाप के लिए ॐ नमो भगवते वासुदेवाय का 108 बार जप करें। विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना इस दिन उत्तम फल देता है।
  • व्रत कथा का श्रवण या पाठ अवश्य करें। अजा एकादशी की व्रत कथा पद्म पुराण पर आधारित है और इसे सुनने मात्र से व्रत का पूर्ण फल मिलता है।
  • दिन भर चावल और तामसिक भोजन का पूर्णतः त्याग रखें। क्रोध, व्यर्थ वार्तालाप और निद्रा से बचें। मन को भजन, कीर्तन या विष्णु नाम स्मरण में लगाए रखें।
  • अन्न-दान का विशेष महत्व है इस दिन। किसी जरूरतमंद को भोजन कराएं, अन्न और वस्त्र दान करें। पद्म पुराण के अनुसार इस दिन किया गया अन्न-दान सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक पुण्यफल देता है।
  • रात्रि जागरण करें और भगवान विष्णु के भजनों में समय व्यतीत करें। मुनि गौतम ने राजा हरिश्चंद्र को भी रात्रि जागरण का विधान बताया था। यदि पूर्ण जागरण संभव न हो तो कुछ समय विष्णु चालीसा या सहस्रनाम के पाठ में अवश्य लगाएं।
  • पारण (8 सितंबर) प्रातः 6:02 से 8:33 बजे के बीच करें। पहले हरि वासर की समाप्ति की प्रतीक्षा करें, फिर तुलसी दल युक्त जल से व्रत तोड़ें। पारण में देरी न करें और द्वादशी तिथि के भीतर ही उपवास खोलें।
  • पारण के दिन किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन और वस्त्र दान करें। यह कार्य व्रत के पुण्य को और अधिक सुदृढ़ करता है और व्रत को पूर्णता प्रदान करता है।

Aja Ekadashi Vrat Katha: अजा एकादशी की व्रत कथा

मुनि गौतम राजा हरिश्चंद्र को अजा एकादशी का व्रत बताते हुए, ऊपर भगवान विष्णु का दिव्य दर्शन, व्रत कथा चित्र

पद्म पुराण में वर्णित यह कथा सत्य के उस महाराजा की है जिनका नाम इतिहास में अमर है। राजा हरिश्चंद्र सूर्यवंशी सम्राट थे, अपने वचन पर अटल, सत्य के प्रतीक। किंतु किसी पूर्वकर्म के फल से उन्हें अपना राज्य गंवाना पड़ा। संकट इतना गहरा था कि उन्हें अपनी पत्नी और पुत्र को बेचना पड़ा और स्वयं भी एक चांडाल के दास बन गए। श्मशान में मृतकों के वस्त्र उतारने का कार्य उनके हिस्से आया। सम्राट से श्मशान तक की यह यात्रा वर्षों में तय हुई, पर सत्य का दामन उन्होंने एक पल के लिए भी नहीं छोड़ा।

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

एक दिन राजा हरिश्चंद्र पाप के उस अथाह सागर में डूबते हुए सोच रहे थे, “अब मैं क्या करूं, कहाँ जाऊं, इस दुख से कैसे उबरूं?” तब ब्रह्मा द्वारा सृजित, परोपकार के लिए समर्पित, महर्षि गौतम वहाँ प्रकट हुए। राजा ने उन्हें देखा, हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े हो गए और अपना सारा वृत्तांत आँसुओं के साथ सुनाया। महर्षि गौतम यह सुनकर चकित हो गए। उन्होंने राजा को शांत करते हुए कहा, “राजन, भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की जो एकादशी है, उसे अजा कहते हैं और वह महान पुण्य देने वाली है। इस व्रत को करो, रात भर जागरण करो। तुम्हारा पाप सात दिन में समाप्त हो जाएगा। मेरे धर्म के प्रभाव से मैं यहाँ तुम्हारी सहायता को आया हूँ।” इतना कहकर महर्षि अंतर्धान हो गए।

सत्य का मार्ग कितना भी कठिन हो, भगवान की कृपा उसे कभी असहाय नहीं छोड़ती।
अजा एकादशी का व्रत उसी कृपा का प्रमाण है।

राजा हरिश्चंद्र ने महर्षि के वचनों पर श्रद्धा रखी और अजा एकादशी का व्रत विधिपूर्वक किया। रात भर जागकर भगवान विष्णु का स्मरण किया। व्रत पूर्ण होते ही उनके वर्षों के पाप एक क्षण में नष्ट हो गए। आकाश में नगाड़े बजे, पुष्पवर्षा हुई। राजा अपनी पत्नी और पुत्र से मिले, अपना राज्य वापस पाया और पूरी नगरी के साथ स्वर्ग को प्राप्त हुए।

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

जो भक्त अजा एकादशी का व्रत श्रद्धापूर्वक करता है, रात्रि जागरण रखता है और यह कथा सुनता या पढ़ता है,
उसे समस्त पापों से मुक्ति मिलती है, स्वर्ग की प्राप्ति होती है और अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य मिलता है।


अजा एकादशी पर जपने योग्य मंत्र

विष्णु मंत्र:
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

विष्णु गायत्री मंत्र:
ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्

नारायण मंत्र:
ॐ नमो नारायणाय

श्री विष्णु मंत्र:
ॐ विष्णवे नमः

कृष्णाय वासुदेवाय मंत्र:
ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।
प्रणतः क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः।।

शान्ताकारं मंत्र
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं ।
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम् ।
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ।।

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अजा एकादशी व्रत: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

अजा एकादशी 2026 में कब है? अजा एकादशी सोमवार, 7 सितंबर 2026 को है। एकादशी तिथि 6 सितंबर को सायं 7:29 बजे आरंभ होगी और 7 सितंबर को सायं 5:04 बजे समाप्त होगी। उदयातिथि के अनुसार व्रत 7 सितंबर को ही रखा जाएगा।

अजा एकादशी का पारण कब करें? पारण 8 सितंबर 2026 को प्रातः 6:02 बजे से 8:33 बजे के मध्य करें। पारण से पूर्व भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए जल या फल ग्रहण करें, उसके बाद सात्विक भोजन करें।

अजा एकादशी को अन्नदा एकादशी क्यों कहते हैं? इस एकादशी पर अन्न-दान का असाधारण महत्व है। अन्नदा अर्थात अन्न देने वाली: जो भक्त इस दिन ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को भोजन कराता है, उसे सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक पुण्य मिलता है। इसीलिए इसे अन्नदा एकादशी भी कहते हैं।

अजा एकादशी किस मास में आती है? अजा एकादशी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को पड़ती है। पद्म पुराण में इस व्रत का वर्णन है और इसे पितृ मोक्ष के लिए श्रेष्ठ बताया गया है।

अजा एकादशी पर कौन से मंत्र जपें? इस दिन ॐ नमो भगवते वासुदेवाय और ॐ नमो नारायणाय मंत्र का 108 बार जप करें। विष्णु सहस्रनाम का पाठ भी इस दिन विशेष फलदायी माना गया है।

अजा एकादशी पर पितृ तर्पण करना चाहिए? हां, भाद्रपद कृष्ण पक्ष में पितृ तर्पण का विशेष महत्व है। अजा एकादशी के दिन पूर्वजों का स्मरण करते हुए जलाभिषेक और तर्पण करना चाहिए। जिन परिवारों में पितृ दोष हो, उनके लिए यह व्रत और तर्पण विशेष रूप से उपकारी माना गया है।

दशमी के दिन क्या खाना चाहिए और क्या नहीं? दशमी (6 सितंबर) को सूर्यास्त से पहले एक बार सात्विक और हल्का भोजन करें। चावल, उड़द दाल, प्याज, लहसुन और तामसिक भोजन वर्जित है। यही अंतिम भोजन होगा, इसलिए पौष्टिक पर सुपाच्य चुनें।

अजा एकादशी पर क्या दान करें? इस दिन अन्न, वस्त्र और जल का दान करना शुभ माना जाता है। पद्म पुराण के अनुसार इस एकादशी पर किया गया अन्न-दान पितरों की तृप्ति और व्रती के पुण्य दोनों में वृद्धि करता है।

हरि वासर क्या है और पारण से पहले इसकी प्रतीक्षा क्यों करें? हरि वासर द्वादशी तिथि का प्रथम एक चौथाई समय होता है। शास्त्रों के अनुसार इस काल में व्रत तोड़ना अशुभ माना जाता है। 8 सितंबर को हरि वासर समाप्ति के पश्चात प्रातः 6:02 बजे से पारण करें।

क्या रात्रि जागरण करना जरूरी है? रात्रि जागरण अनिवार्य नहीं, किंतु अत्यंत फलदायी माना जाता है। पद्म पुराण की कथा में मुनि गौतम ने राजा हरिश्चंद्र को भी जागरण की सलाह दी थी। यदि पूर्ण जागरण संभव न हो तो कुछ समय विष्णु सहस्रनाम, भजन या हरे कृष्ण महामंत्र के जप में लगाएं।


हरि अनंत, हरि कथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुविधि सब संता॥

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